कितने तूफान

समाज की चुभती हुई नज़रों को केतकी साफ महसूस करती थी। अकेली औरत वैसे भी कहीं दया की पात्र बन जाती है तो कहीं ललचाई नज़रों का भाजन । उसे अपनी बड़ी होती बेटी की चिंता भी थी जिसके सिर पर बाप का साया नहीं था...
कितने तूफान

फीचर्स डेस्क। वो एक तूफान था ....एक कहर...जिसके बीच से हम सबको गुज़रना था.......पर केतकी......उसके लिए तो पूरा जीवन ही तूफान बन गया था ...जिसे जीवन के हर पल..हर क्षण उस तूफान को झेलना था। सत्यजीत नहीं रहे इस खबर ने हम परिवार वालों पर कहर बरपाया दिया था। सत्यजीत मोटरसाइकिल पर जा रहे थे पीछे मोहित बैठा था। सामने से आती बस ने ऐसा लपेटे में लिया कि सड़क ही नागिन बन कर डस गई। केतकी के सारे व्रत ,सारे मंत्र तुलसी पत्ते देने के सारे टोटके खत्म हो गए।

सत्यजीत ने तो मौके पर ही दम तोड दिया। मोहित को राह्गीरों ने ही अस्पताल पहुँचाया और केतकी  को बस सूचना भर मिली।

केतकी  की इतनी कड़ी परीक्षा ली ईश्वर ने कि उससे सुहाग भी छीन लिया और उसे रोने भी नहीं दिया । उसके मुँह से ही कहलवाया कि ईश्वर तूने जो किया मंजूर है पर अब मोहित की जान बक्श दे । वो 13 दिन भी मातम मनाने नहीं बैठ पाई। अस्पताल का एक कोना ही उसके लिए मातमी दरी बन गया।

समय का घाव भरता है...ज़रूर भरता है। हम परिवार वाले तो तूफान गुजरने की कहानियों को कहते-कहते किनारा कर रहे थे। पर केतकी को तो तूफान से ता-उम्र गुजरना था। मोहित धीरे-धीरे ठीक हो रहा था । नन्हा-सा बच्चा इतनी बड़ी दुर्घटना को समझने की अबोध कोशिश में यह नहीं जान पाया था कि वो मोटर साइकिल पर ले जाने वाले अपने पापा को खो चुका है। दोनों हाथों और पैरों का फ्रैकचर अब ठीक हो रहा था।

अस्पताल के घेरे से तीन महीने बाद निकली तो केतकी को अपना संसार उजड़ा हुआ नज़र आया । मोहित और मोक्षी को लेकर वो कैसे ज़िन्दगी निकालेगी केतकी समझ नहीं पा रही थी। मोक्षी के तो अभी दूध के दांत भी नहीं झरे थे और मोहित पाँचवीं कक्षा में पढ रहा था। उसने घर पहुँच कर अपने दोनों बच्चों को गले लगा लिया और फफक पड़ी । मत रो......अब यही तेरा सहारा है ....इनकी फिकर कर..... सासू माँ ने केतकी  की सुध ली थी।

आज से तू ही हमारा बेटा है और तू ही हमारी बहू..... ससुर जी भी डबडबाई आँखों को सम्भाले हुए बोले थे। इतना सम्बल काफी था केतकी के लिए । वो भी भरे गले से बोल पड़ी थी- हाँ  पापाजी ! आज से मैं आपका बेटा भी हूँ और बहू भी...इन बच्चों की माँ भी हूँ और पापा भी

सबकी आँखों से सरिता बह निकली। सरिता के साथ कितने संकल्प पत्थर बनने की कोशिश कर रहे थे। सब अपने-अपने संकल्पों को दृढ करने की कोशिश कर रहे थे। मोहित स्तब्ध था पर मोक्षी को कोई अहसास नहीं था। वो अपनी माँ का हाथ पकड़ कर कह रही थी मेरे पापा आइसक्रीम लाते थी ना वनिला और ऑरेंज भी...... नन्हीं आँखों के नन्हें सपने होते हैं पर केतकी के सामने तो कईं तूफान खड़े थे जिनसे उसे गुजरना था। घर को मन्दिर मानने वाली केतकी......रोज़ शाम को दिदिपाते सिन्दूर और चूड़ी बिन्दी से सजी सत्य का इंतज़ार करती केतकी को अब सत्यजीत की जगह अनुकम्पा की नौकरी की दरकार थी। सरकारी कार्यालयों के आगे चक्कर लगाते-लगाते उसकी चप्पलें घिस चुकी थी । पर इस तूफान से उसने हार नहीं मानी थी। इस तूफान से हार मानने का मतलब था उसे ज़िन्दगी के और तूफानों के सामने जल्दी से हार मान लेनी होगी ।

छ: महीने की अथक भागदौड़ के बाद केतकी ने सत्यजीत की जगह नौकरी पा ली थी। नई नौकरी , नया माहौल और तरह-तरह के लोगों के बीच केतकी अपना दर्द भी कैसे बयान करती। इन परिस्थितियों में मोहित की पढाई और मोक्षी का पालन उसके लिए एक चुनौती थी। भले ही सास-ससुर उसके साथ पहले की तरह रह रहे थे। पर अब केतकी का ध्यान अपने बच्चों में ज्यादा था। उसे अपने बच्चों के लिए पापा के भूमिका भी अदा करनी थी । बच्चों की फीस जमा करवाने, घर का राशन-पानी लाने, बैंक संबन्धी सारे काम करने थे जो सत्यजीत किया करते थे। केतकी  उन्हें मुस्तैदी से निपटाती ताकि बच्चों और सास-ससुर के मन में सत्यजीत की कमी महसूस ना हो।   

परिवार के लोग जल्दी ही पीछे सरक गए थे। जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, ननद-नन्दोई, भाई-भाभी सबका हुजूम अपने-अपने रास्तों पर चला गया था। फोन का सिलसिला जारी था जो धीरे-धीरे व्यस्त ज़िन्दगी की रफ्तार में घुल कर कम हो गया था। केतकी  के माता-पिता उसके गम में सूख कर कांटा हो गए थे।

केतकी  की माँ के दिल के किसी कोने में उसके पुनर्विवाह की हुड़क उठती थी पर केतकी की आँखों में तैरते सैलाब के सामने मूक हो जाती । केतकी की सहेली के जरिए माँ ने अपनी बात कहलवाने की कोशिश भी की। सहेली विभा ने अप्रत्यक्ष रूप से पूछने की कोशिश को केतकी ने यह कहकर बीच में ही काट दिया कि जीवन का यह अध्याय अब समाप्त हो चुका है विभा ? अब इस बात पर बात करने से क्या फायदा ??

समाज की चुभती हुई नज़रों को केतकी साफ महसूस करती थी। अकेली औरत वैसे भी कहीं दया की पात्र बन जाती है तो कहीं ललचाई नज़रों का भाजन । उसे अपनी बड़ी होती बेटी की चिंता भी थी जिसके सिर पर बाप का साया नहीं था ।

बड़े होते बच्चों की माँ के पुनर्विवाह की बात ना समाज सोचता है ना वो स्वयं । कोई विवेकानन्द या दयानन्द नहीं पैदा होता इस समाज में । बस यादों के सहारे ही विधवा जीवन निकालना होता है । भले ही समाज प्रगतिवादी होने का कितना ही दम्म भरता हो पर सच तो यह है कि मंगल कार्यों में भी विधवा-निषेध का अलिखित नियम रख दिया जाता है। ऐसे कितने ही वाकयों से केतकी  गुजरी होगी.....कितने ही मंगल कामों में स्वयं को कट कर निकलना पड़ा होगा। केतकी ने चमकीले काम और सुनहरे तार वाली साड़ियों का भी त्याग कर दिया था । शादी-ब्याह के अवसरों पर जब सब जेवरों से लक-दक चहक रहे होते तो वो किसी कोने में साधारण साड़ी लपेटे प्लेट में कुछ निगलने की कोशिश कर रही होती । इन्हें तो वो छोटा-मोटा तूफान मानती थी जिन्हें हाथ की पतवार से ही चीर सकती थी । पर बड़ॆ तूफानों से वो ज़रा विचलित हो जाता थी । आँखें डबडबा ज़रूर जाती पर उन्हें आँखों की कोरों से बहने नहीं देती और होंठ सिलकर पूरे दम के साथ उस तूफान से बाहर निकल जाती।

मोहित के कैरियर का समय भी आ गया था । उसके पापा की भूमिका में केतकी मोर्चे पर थी । मोहित बुद्धिमान था और कुछ कर गुजरने की चाह में था । केतकी को उसके पापा का सपना याद था कि उसे इंजीनियर बनाना है। कोचिंग के लिए उसको शहर से बाहर भेजने की व्यवस्था करना आर्थिक और मानसिक स्तर पर एक तूफान गुजरने के बराबर था ।

पूरे दो साल के तूफानी दौर के बाद मोहित का एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया था । केतकी की आँखें बोलने लगी थी कि तूफान अब थम गए है । एक सुकून था उसके चेहरे पर ईश्वर को कहाँ मंज़ूर था ।

नियति का कहर एक बार फिर केतकी के परिवार पर बरपा था । एक बस दुर्घटना में केतकी के जेठ-जेठानी और बेटा घायल हो गए । जेठ और बेटी को मामूली चोटें आई और जेठानी कोमा में चली गई और यह बेहोशी मौत के साथ ही टूटी । पूरा परिवार क्रन्दन कर उठा । केतकी के ज़ख्म ताज़ा हो गए थे । सत्यजीत को गए पूरे सात साल बीत चुके थे । इन सात सालों में केतकी गम और दर्द में खामोश होती चली गई थी। चुपचाप अपने काम करती । सास-ससुर भी उसका सम्बल बने हुए थे । पर कईं बार केतकी  भी भावनात्मक रूप से अकेली पड़ जाती । आखिर सत्यजीत की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था । पर कौन देता उसे वो भावनात्मक सम्बल ? पुनर्विवाह की बात उसे किताबों के किस्से लगते। दयानन्द सरस्वती उसे किसी दूसरे लोक के अवतार नज़र आते थे। वो खुद भी तो कौनसे संस्कारों की घुट्टी पीए थी। मन के चक्रवातों को उसने बाहर नहीं घूमने दिया।

परिवार का कारुणिक क्रन्दन तीन दिन बाद सिसकियों में बदला तो सिसकियों में सासू माँ की भीगी-भीगी से आवाज़ केतकी के कानों में पड़ी थी- कैसे रहेगा अकेला ...अब कैसे ज़िन्दगी गुजारेगा.........

घुटनों में सिर दिए केतकी ने चौंक कर माँजी को अधमुन्दी आँखों से देखा था ।सत्यजीत की मौत पर तो ऐसी ना बोली थी माँजी ! होठों की सीवन थोड़ी ढीली हुई थी । वो बुदबुदा उठी थी- जैसे मैं रही हूँ माँजी.....जैसे मैं    

नहीं रे !.... तेरी बात और है मासी-सास रुन्धे गले से बोली थी । फिर कोई मातम मनाने समाज के लोग कमरे में आए तो सबकी सिसकियाँ फिर से विलाप में बदल गई थी ।

पर मासी-सास की बात केतकी के दिल में फांससी चुभ गई थी । क्यों ! ? क्या वो इंसान नहीं है ? सत्यजीत की मौत पर तो यही रिश्तेदारों के प्रवचन चलते थे । अपने बच्चों का मुँह देख ....सोच सुहाग तेरे नसीब में ही नहीं था....बच्चों की खातिर तो जीना ही पड़ेगा ना.......और अब जेठानी जी की मौत पर उन्ही रिश्तेदारो की बातों का रुख ही बदल गया था....अरे औरत बिना घर थोड़ा चले है.....अरे आदमी अकेला ना रह सके....आदमी की शादी को कौन रोके है ।

.मातमी 13 दिनों में धीमी-धीमी चर्चा उबर कर सामने आई थी कि जेठ जी की शादी तो होगी । केतकी  का कलेजा मुँह को आने लगा था । एक दिन सांझ ढले मातमी दिनों में ही रिश्तेदारों की गुमटी में बैठी केतकी की सास विलाप भरी आवाज़ में बोल रही थी कैसे रहेगा मेरा पिंटू ...अकेला कैसे सम्भालेगा अपने बच्चों को....हाय रे ! उसकी गृहस्थी की नैया कैसे पर लगेगी । केतकी  रसोई से निकल कर बड़े आत्मविश्वास से बोली थी जैसे मैं रही हूँ माँजी ! जैसे मेरी नैया खिव रही है वैसे ही माँजी ।

अरे नहीं ! नहीं औरत तो सम्भाल लेती है घर पर उसे तो आटा भी गूँथना नहीं आता......सब्ज़ी बनाना भी नहीं आता

मुझे भी तो आटा खरीदना नहीं आता था और सब्ज़ी खरीदना भी नहीं आता था ....बैंक जाना भी नहीं आता था...और....औरा. ऑफिस जाकर कमाना भी नहीं आता था...... रुन्धा गला धार में बदल गया था ।

अरे तू नहीं समझेगी ....उसकी तो बेटी भी जवान है ...शादी ब्याह कैसे करेगा ?....कन्यादान कैसे करेगा ?

मेरी मोक्षी तो अबोध थी माँजी उसे तो पापा के साए की सख्त ज़रूरत थी...फिर मेरी मोक्षी की शादी होगी वैसे ही उनकी बेटी की भी हो जाएगी

........ माँजी खामोश थी ।

आपने मेरी शादी के बारे में सोचा था...आप्ने मेरे जीवन के बारेव मे सोचा था कि मैं इतने छोटे बच्चो को लेकर ज़िन्दगे के कंकरीले रास्ते पर कैसे चलूँगी .....यह कहकर केतकी  रसोई में चली गई ।

पीछे फुसफुसाती आवाज़ में किसी रिश्तेदार की आवाज़ थी .... अरे समझती ही नहीं...इसी के भले के लिए कह रहे हैं । अरे घर की बात घर में ही रह जाएगी...और दोनों की ज़िन्दगी संवर जाएगी

केतकी  के हाथ से कप छूट कर चकनाचूर हो गया था । आँखों में आँसुओं का सैलाब  था । एक तूफान यह भी था । रिश्तेदारों की अटकलों, निर्णयों और सुझावों के बीच दबी उसकी सासू माँ केतकी  के सामने सफ्शब्दों में यह मुँह तो नहीं खोल पाई कि मेरे पिंटू के साथ विवाह की सहमति देती हूँ पर आधे अधूरे जुमलों ने केतकी  को यह ज़रूर समझा दिया था कि सब लोग जेठ जी के विवाह की बात केतकी  से करने की सोच रहे हैं ।केतकी  के मन में सुलगती आग फिर से भभक उठी थी । ज़िन्दगी किस मोड पर क्या करवट लेगी आ है । 13 दिन के मातमी दौर से गुजरने के बाद जेठानी को याद करने के बजाय जेठजी की शादी की मुहिम तेज हो गई थी । केतकी  फिर से तूफानी दौर में प्रवेश कर चुकी थी । क्या यही संसार है ....? केतकी सत्यजीत को भुला नहीं पाई । घर के हर कोने में सत्यजीत की उपस्थिति महसूस करती। उसके हर कपड़े में आलमारी में यहाँ तक कि मोटर साइकिल में भी सत्यजीत को देखती । जहाँ-जहाँ सत्यजीत का स्पर्श था वहाँ वहाँ अपने हाथों का स्पर्श देकर महसूस करती। उन दीवारों और दरवाजों से लिपटॅ कर रोती जो सत्यजीत ने उस दिवाली पर खुद अपने हाथ से रंगे थे । आखिर तो इंसान ही थी ना केतेकी । ख्वाबों मे ख्वाब देखती थी अपनी शादी के। उसे लगता कोई आ रहा है उसे वरमाला पह्गनाने या वो अग्नि को साक्शी मनते हुए फेरे ले रही है.....उससे गले मिलने को जैसे ही आगे बधती देखती ये तो सत्य्वान ही है....उस्का ख्वाब टूटॅता तो वो कम्ज़ोर नही होती बल्कि उअर भी मज्बूत हो जाती कि उसके जीवन में सत्यवान के अलावा कोई और नहीं हो सकता ।

और यहाँ जेठ जी 13 दिन में जेठानी को इस कदर भुला बैठे कि उसकी जगह किसी और औरत को लाने की तैयारी कर रहे है । क्या यही औरत की अहमियत है । इधर केतकी  पर शादी का दबाव बढता जा रहा था । सास-ससुर ने केतकी  के माता-पिता को भी सन्देश भेजा था । माता-पिता ने भी केतकी  की भावनाओं के बजाय सामाजिक व्यवस्था पर ध्यान रखते हुए प्रस्ताव उन्हें भी बुरा नहीं लगा । माता-पिता के कहते ही केतकी  फट पड़ी थी माँ ! आज आपको याद आई मेरे विवाह की ....पूरे सात साल बाद....मुश्किल समय तो निकल गया मेरा.....तब आपने नहीं सोचा कि मेरी केतकी  कैसे रहेगी....अकेली....कच्ची खा जाने वाली नज़रों के बीच आप्ने अपनी बेटी को झोंक दिया नहीं बेटी ....हमने तो सोचा था ....पर तू नहीं मानी थी.....तू खामोश थी ......

हाँ ! हाँ ! मैं खामोश थी.....इस समाज में विधवा की शादी होती ही कहाँ है...संस्कार की घुट्टी मे ही यह पिलाया जाता है । क्या मैंने शादी का सपना नहीं देखा होगा ? क्या मुझे इस पाशविक संसार के भंवर से निकलने क्ले लिए कोई खिवैया नही चहिए था ? फिर यह दबाव आपने तब क्यों नहीं बनाया

नहीं...नही बेटी...पर ये तो घर का घर में ही है ना 

तो आप मेरे जेठ जी की सहूलियत का ख्याल है और मेरे भले के लिए आप घर की किसी औरत के मरने का इंतज़ार कर रहे थे....

सास बोली थी  हम कैसे यह बर्दश्त कर लेते कि हमारे घर के तीन सद्स्य हमें छोड़ॅ कर चले जाएँ

...मतलब आप्को अपना स्वार्थ था ....मेरे ज़िन्दगी से तो कोई मतलब नही था ना ....

.......अब परिस्थिति ऐसी आ गई है ना .... केतकी की माँ ने धीरे से कहा था ।

परिस्थिति...?  मन करता है अट्टहास करूँ इस परिस्थिति का जिसने हमारे घर के दो सद्स्यों की ज़िन्दगी और लील ले

माँ उसके सिर पर हाथ फेरने लगी थी । सासू माँ भी उसके नज़दीक आ गई थी ।

........शादी कोई गुड्डे गुड़िया का खेल नही है माँ....आप ही तो कहती थी ये सात जन्म का बन्धन है.... नहीं....! ये कभी नहीं होगा....कभी नहीं होगा..... और केतकी  कटे पेड़ की तरह पलंग पर औंधे मुँह जा गिरी ।

सास ससुर की एक उम्मीद टूटी थी पर सपने नहीं छूटे थे । केतकी  से अबोला और विवाह की मुहिम तेज़ हो गई थी । अंतत: 50 वर्षीय जेठजी के लिए दुल्हन ढूँढ ही ली थी । केतकी  को सूचना भर दी गई थी । कल सुबह की गाड़ी जा रहे थे परिवार के सभी सद्स्य विवाह रचाने । केतकी  नहीं जा रही थी....आखिर मंगल कार्यों में उसकी अनुपस्थिति वर्जित जो थी । केतकी  के मन का एक तूफान और तेज़ हो गया था ।

इनपुट सोर्स : संगीता सेठी,  प्रशासनिक अधिकारी, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई।


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