पार्ट 2 : कमल सरोवर

पार्ट 2 : कमल सरोवर

नितिन जी ये मेरे पति हैं, एक एक्सीडेंट में इनका दोनों पैर खराब हो गया तो घर पर ही रहते हैं और मुझे अल्फ्रेड पार्क मे सुरक्षाकर्मी की नौकरी करनी पड़ी।

नितिन- ओहह !

मधु- चाय बनाउ ?

आरे, नहीं मैं कल से आ जाऊग कहते हुए तेजी से नितिन बाहर की तरफ लपका और निकल गया।

अब नितिन जब भी पढ़ाने जाता तो मधु का पति बंटी उसको अजीब सा नजरों से देखता रहता, न जाने उसके मन में कितने डर थे और क्यो ? ये सीलसिला चलता रहा। फिर एक दिन नितिन पहुंचा तो घर में कोई नहीं बाहर से ताला बंद।

नितिन- कहा गए सब ? उस घर के आस-पास कोई घर नहीं था सिर्फ बड़ी-बड़ी जंगली घास और झाड़ीं के सिवा और कुछ नहीं। सोचते हुए वह आगे बढ़ा ही था की सामने से तेजी से मधु आती दिखी शायद उसके टाइम पर आने की जल्दी थी।

मधु- अरे नितिन रुको, कहा जा रहे हो ?

नितिन- ताला बंद था तो वापस जा रहा था।

मधु : आओ बैठो, बंटी की कुछ तबीयत खराब थी तो एसआरएन में भर्ती करा कर आ रहीं हूँ। इतना कह कर घर के अंदर पड़ी एक चारपाई पर बैठने का इशारा की और खुद मुह-हाथ धोने चली गई। लौटी तो उसके आँखों में चमक थी और होठो पर कपकपी के साथ शरारत भी ।

नितिन- मैं जा रहा हूँ?

मधु- रुको, बात करनी है जानते हो नीतिन मुझे बंटी पर बिल्कुल दया नहीं आती इतना कह कर मधु लापरवही से अंगड़ाई लेते हुए एकदम पास आ गई और बोली ये सब इसके कर्मों का फल है, जब जवान था तो रोज वेश्याओं का मीरगंज मे चक्कर मारता था, क्या मै सुंदर नहीं हूँ? कहते हुए मधु ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए नाखून गड़ा दिये।

नितिन चौक गया। वह मधु की तरफ आश्चर्य से देखता रहा, कुछ बोला नहीं।

“क्यो तुमको ताज्जुब क्यो होता है ?” मधु ने कुछ मुस्कराकर कहा, “लेकिन मैं सच कहती हूँ”- वह बहुत गंभीर हो गई। “ मुझे जरा सा भी तरस नहीं आता इसके अपाहिज होने पर”। क्षण-भर चुप रही, फिर जैसे बहुत तेजी से बोली तुम जानते मुझे तो शादी से नफरत हो गई है। “तुम शादी न करना” मुझे शादी से नफरत है, शादी के बाद होने वाली आपसी धोखेबाज़ी से नफरत है।

मधु चुप हो गई। उसका चेहरा सुर्ख हो गया था। थोड़ी देर बाद उसका तैश उतर गया और वह अपने आवेश पर खुद शरमा गई। उठकर वह नितिन के पास गई और उसके कंधो पर हाथ रख कर बोली “बंटी से मत कहना अच्छा?”

नितिन ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी और उठकर चलने के लिए खड़ा हुआ। मधु ने उसके कंधे पर हाथ रखा और अपनी तरफ घूमाकर कहा, “देखो, पिछले चार साल से बहुत अकेली थी, और किसी दोस्त का इंतजार कर रही थी, तुम आए और अब तुम दोस्त हो तो अब कभी न जाना हमेशा आते रहना, एँ”?

“अच्छा!” नितिन ने गंभीरता से कहा ।

मधु उसके साथ फाटक तक छोडने आई, नितिन ने पता नहीं क्यो मधु को जल्दी में अभिवादन किया और चल दिया।

नितिन को पढ़ाते हुए अभी कुछ दिन बीते थे की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अपनी कक्षाओ के लिए जाना शुरू किया। अभी पूरे सात दिन भी नहीं हुए थे कि एक दिन प्राचीन इतिहास का पीरियड था और मिस चंद्रा पढ़ा रहीं थीं। बीच कि एक बेंच पर कतार से प्रिया, नलिनी, प्रभा, शालू और सुधा बैठी थी। हिस्सा बाँट अभी तक कायम था, सभी ने इन सात दिनों अपने-अपने लिए सपनों के राजकुमार भी पसंद कर लिए थे। बेंच के आखरी छोर पर बैठी सुधा को यह सब पसंद नहीं तो इनसे थोड़ा खिसक कर ही बैठती थी।

मिस चंद्रा हमारे देश मे कब मुगलों ने शासन किया सबसे पहले कौन शासक आया और कहा मंदिर तोड़े कौन से मस्जिद बनवाया मेज के बगल में हाथ में किताब लिए खड़ी उस पर निगाहे लगाए लगातार बोले जा रहीं थीं।

सहसा शालू ने मिस चंद्रा से पूछा, “ मैडम ये मुगल शासक शादी कर के दुल्हन लेकर आते थे यही वह भी करते थे?” सभी हंस पड़े।

मिस चंद्रा ने बहुत गुस्से में शालू कि तरफ देखा और डांट कर कहा, “ आज के बाद कभी कोई कक्षा में इस तरह का बात नहीं करेगा और फिर पढ़ने लगीं।

सहसा प्रभा ने कोहनी मारकर प्रिया से कहा चल फिर हम लोग सुधा के लिए राजकुमार खोजते हैं, मिस चंद्रा के घंटे में।“

और फिर सब एक साथ हंस पड़ीं लेकिन इस बार आवाज मिस चंद्रा तक नहीं पहुंची। सुधा इन सब के कारण परेशान हो उठी थी वह पढ़ना चाहती थी। आगे कि लाइन और सुधा के ठीक सामने नितिन बैठा करता था। सुधा अपने सहेलियों को बिना बताए रोज-रोज उसकी ओर देखा करती थी। कभी उसके कमीज को तो कभी उसके सिर पर पीछे बालों को।

एक दिन मिस चंदा कक्षा में थी उनका लेक्चर चल रहा था वह कुछ लिखा रहीं थीं । अचानक से नितिन का पेन हाथ से छूटा और पीछे कि तरफ बेंच के नीचे और सुधा के पैर के पास जा गिरा। नितिन पेन लेने के लिए नीचे झुका ही था कि सुधा ने लपककर पेन उठा ली और नितिन को पकड़ाते हुए उसके अगुलियों को छु ली। सुधा के इस तरह के छुअन से नितिन समझ गया दरअसल, हर रोज पीछे बैठी सुधा की बाकी के सहेलियों को बातें भी उसके कानों में छन कर कुछ जाया करती थीं।

अब हर रोज मिस चंदा कि कक्षा में दोनों आगे पीछे बैठेते बाकी के 2 विषय अलग-अलग थे। सुधा और नितिन के मन से मन का इस रोज-रोज के मिलन कि भनक लड़कों को भले ही न लेकिन बाकी के सहेलियों को लग गया था। बस मज़ाक कर-कर के पुख्ता करने में लगीं थीं।

आज मिस चंदा कि कक्षा नहीं थी शायद आज उन्हें कोई काम था और वह नहीं आई थीं। सुधा सहित चारों सहलियाँ कैंपस के बीचों-बीच एक छोटा सा पार्क और उसमे घास पर बैठकर सभी गप-मार रहीं थीं।

सहसा शालू ने कहा क्या रे सुधा मेरी जान कब तक छिपाओगी, हमसे कब बताओगी। सुधा को अंदर से तो अच्छा लगा लेकिन बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कुछ बोलती कि हंसी छुट गई और वहीं घास पर ही धड़ाम से लेट गई और अपने ओढनी से अपने मुह को छिपा लिया।

अभी चारों सहेलियाँ उसको छेड़ ही रहीं थी कि क्लास का टाइम हुआ और सब अपने अपने क्लास चली गईं। इस तरह से समय बीत रहा था बाकी की तो नहीं पर जब भी कोई क्लास न होती तो सुधा और शालू कैंपस के बीचों बीच बने पार्क में आ जाया करती थीं। घास, फूल लतर और शायरी का शौक शालू ने अपनी माँ से विरासत में पाया था। किस्मत से आगे की पढ़ाई के लिए उसने ऐसा कालेज चुना जहां जहां हरे भरे पेड़ पौधे और फूल उसके मन को खुश कर दिया करते थे, ऐसे में वह जब भी मौका मिलता सुधा के साथ भाग कर पार्क के उस घास पर लेट कर सपने देखने की आदि हो गई थी। आम की घनी छाव और हरी-हरी दुब पर दोनों सिर के नीचे हाथ रखकर लेटे रहतीं और दुनिया भर की बातें करतीं। बातों में छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी किस तरह की बातें करती यह वही जन सकता है, जिसने कभी दो अभिन्न सहेलियों की एकांत वार्ता सुनी हो। गालिब के शायरी से लेकर पड़ोस वाली भाभी के पहले के इश्क के बारें में शालू बताया करती थी और शरत के उपन्यासों से लेकर अपने गाव के लोगो की प्रेम कहानी सुधा सुनाया करती थी। दोनों अपने अपने मन की बातें एक दूसरे को बता डाला करती थीं और जितना भावुक, प्यारा, अनजान और सुकुमार दोनों का मन था उतनी ही सुकुमार दोनों की बातें। हाँ भावुक और सुकुमार दोनों ही थीं लेकिन दोनों मे एक अंतर था। शालू शायर होते हुए भी इस दुनिया की थी और सुधा शायर न होते हुए भी कल्पनालोक की थी। शालू पार्क के फूलों को तोड़ती उन्हे अपने चोटी में सजाती और उस पर शायरी बनाती तो सुधा लतरों के बीच में सिर रखकर लेट जाती और अपलक फूलों को देखती रहती और आँखों से न जाने क्या पीकर उन्हे उन्हीं की डालों में खिलता हुआ छोड़ देती। शालू हर चीज का सही इस्तेमाल जानती थी कहा किस चीज को प्यार करना पसंद करना और उसका उपयोग हैं अच्छी तरह समझती थी, लेकिन सुधा किसी भी फूल में बंध जाना चाहती थी उसी के कल्पना में डूब जाना चाहती थीं लेकिन उसके बाद सुधा को कुछ नहीं मालूम था। सुधा और शालू दोनों के दोस्ती भी इतना पक्की थी की साथ कालेज आती और साथ जाती थीं। जब दोनों एक साथ कालेज में दाखिल होती तो और लड़कियां हँस कर बोलती लो, “चंदा –सूरज की जोड़ी आ गई”! सुधा कम बोलती थी लेकिन उसकी हंसी ने उसके खुशमिजाज साबित कर रखा था और वह सभी की प्यारी थी। ऐसे ही एक दिन प्रिया ने शालू के गले में बाह डालकर कहा, “शालू जान थोड़ी देर के लिए सुधारानी को हमे दे दो हमे उससे कुछ नोट्स तैयार करने हैं उससे पूछकर”।

शालू “हँस कर बोली उसके पापा से तय कर ले, फिर तू ज़िंदगी भर सुधा को पाल पोस मुझे क्या करना”।

सुधा बहुत बदल गई थी इनदिनों नितिन को कालेज में आते देख वह छिप जाया करती थी नितिन उसको नजरों नजरों खोजता और जब दूर तक नजर न आती तो झुझुलकर हाथ मे लिए अपने किताबों से अपने सिर में दे मारता और यह सब देखकर सुधा बहुत खुश होती अपनी जगह नितिन के दिल में महसूस करके वह आनंदित होती और फिर चुपके से एक ककड़ उठकर पीछे से पीठ में मारती और शालू के साथ क्लास में चली जाती। सुधा और नितिन के बारें अभी तक नितिन किसी सहपाठी को भनक तक नहीं थी। नितिन का भोलापन और सुधा का सौमम्यता से किसी को अंदेशा भी नहीं हो सकता था और ना ही अभी तक कभी वो दोनों बात करते हुए कही देखे गए थे। अभी मन ही मन इस प्रेम को अथाह समंदर में गहरे पानी तक जाते और बहुत कुछ पाकर बाहर निकलते रहे।

सुनिए, ये सात-आठ महीने में सुधा का पहला दिन था जब नितिन को कालेज से निकलते वक्त बहुत हिम्मत करके मेंन गेट के पास पीछे से आवाज लगाई थी और उसके यह हिम्मत देने के लिए शालू खूब ज़ोर से सुधा की एक हाथ पकड़ा था। नितिन की धड़कने बहुत तेज हो गई थी वह पीछे मुड़ने की हिम्मत को चुका था, लेकिन एक अंतरात्मा की आवाज उस बेकाबू कर दिया और वह पीछे मुड़ा तो ... क्रमश: कमल सरोवर: से

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