मैं सशक्त...

मैं सशक्त...

फीचर्स डेस्क। चेतना का चेतन मन आज बोझ लेकर चल रहा था। पिछले ३३ बरसों की ज़िन्दगी में उसने ना जाने कितने आयामों को जीया था। होश सम्भालने के बाद की 33 साल की ज़िन्दगी ने कतरा-कतरा कूट कूट कर भरी गयी देह और आत्मा में औरत की ज़िन्दगी बसर करते हुए वो इससे ऊपर उबार ही नहीं पाई कि वो औरत से ऊपर भी कुछ है।

परिवार में लड़की पैदा हुई भले ही बाबा ने रसगुल्ले बाँट दिए तो क्या हुआ समाज में रही तो लड़की जैसे गुनाह किया हो जन्म लेकर। माँ ने घर से स्कूल कॉलेज की दहलीज़ ना लांघने दी भले ही पढाने की मुहिम जारी रखी तो क्या हुआ पुरुष ने उसकी प्रतिभा को समझा ही कहां। ससुराल में मर्दों की बात काटने की कैंची ना पकडाई हो भले ही बहू को बेटी समान ही रखा तो क्या हुआ उसके विचार कब निर्णय में फलीभूत हुए। नौकरी में आई तो अपनी प्रतिभा के ही दम पर भले ही दफ्तर में स्त्रियोचित मर्यादाओं को आँख मूँद कर मानते हुए अपनी प्रतिभा को दर किनार रख दिया हो।

चेतना के चेतन मन की वही खिड़कियाँ और झरोखे बाहर भीतर के इस आंधी-तूफ़ान से फड़-फड़ा रहे थे। माँ की पढाई-लिखाई की मुहिम ने उसे भले ही दफ्तर की नौकरी में पहुंचा दिया था पर चेतना उस दफ्तर की काठ की उस मेज के दायरे पर लम्बे-लम्बे बहीखातेनुमा रजिस्टरों पर फाइलों के विवरण को लिखते-लिखते काठ ही हो गयी थी। चार फुट के फासलों से घूरती आँखें उसके पेन चलती उँगलियों में फंसे अंगूठी पर तो नहीं ,हाँ ! उसकी सुन्दर हस्तलिपि देखकर बोलों में बदल जाती-“ सुन्दर लिपि ” और चेतना अंदर  तक काँप जाती कि कोई तो उसे देख रहा है।

माँ से सवाल करती चेतना “ माँ ! ये ऑफिस वाले पास आकर क्यों नहीं बोलते ”

“ मरी पास जावेंगे तो हंगामा ! बेवजह ” माँ की फूंकनी तेज हो जाती और चूल्हे की लपटें और भी तेज।

“ पर मैं कोई अजूबा तो नहीं ! उन्हीं की तरह इंसान हूँ ! ” चेतना की इंसान बनने की मुहिम उसके चेतन मन में और तेज हो जाती।

शायद माँ ज्यादा समझदार रही होगी। मेज के दायरे , दायरे ही रहें तो दफ्तर के समाज को सुहाता है। कदम दर कदम बढाया नहीं कि विरोध झलकने लगते हैं। चार पाँच साल के अंतराल में 33 प्रतिशत आरक्षण और नौकरियों में महिलाओं को स्थान जैसी मुहिम एक साथ बदलकर चेतना के दफ्तर में महिलाओं की की बढ़ोतरी कर गयी।पिछले 6 सालों में एक-दो करकेलड़कियां भरती होकर आई हैं| दो कम्प्यूटर ऑपरेटर प्रोग्रामिंग के लिए ,दो चार्टर अकाउंटेंट लेखा विभाग के लिए , एक ग्राफिक डिजाइनर वेबसाइट के ले-आउट लिए,एक एम.बी.. किए हुए कस्टमर केयर के लिए| वाह....वाह ! चेतना का दिल दिनों दिन खुल रहा था| इससे पहले चेतना ने काठ के मेज के अलावा दफ्तर देखा हे नहीं था| वो अपनी सीट से उठाकर जाती ही कहाँ थी| पर अब उन प्रोग्रामर लड़कियों के बहाने कम्प्यूटर रूम में जाने लगी थी|

सत्ता के महकमे में खलबली थी| “ अब क्या लड़किया राज करेंगी हम पेवो हिसियाया हुआ क्लर्क बोला था| लड़कियों के हाथों में दफ्तर के लोगों को सुहा नहीं रहा था| चेतना इन लड़कियों के हाथों में कंप्यूटर देखा कर मंत्र-मुग्ध थी| जब लड़कियां कम्प्यूटर के कांच वाले कमरे से बहार निकलती तो कुछ घूरती नज़रों से असहज होकर फिर से अपने कांच के कमरे में दुबक जाती| “बैक-एण्ड पर बखूबी काम करती हुई लड़कियां फ्रंट-एण्ड पर गड़बड़ा क्यों जाती हैं|” चेतना का मन निरंतर यह सोचता रहता है| चेतना उन प्रतिभाशाली लड़कियों की बेबसी देखती तो उसे लगता कि ये वो तितलियां हैं जो अभी अभी कोकून से बाहर आई हैं| वो खुद को ऐसी तितली मानती है जिसके सुंदर पंखों के रंग  इस समाज की धुप से धूमिल हो गए हैं| चेतना को दफ्तर में आये चार साल हो गए हैं पर वो अभी भी आँख उठाकर किसी से बात करने की हिम्मत नहीं कर पाती| उसमें इतनी परिपक्वता तो है कि वो जान सके कि औरत को इज्ज़त से देखने की आँख किसके पास है|

घर-दफ्तर ,पड़ौस-समाज सब जगह चेतना को औरत इन्सान नज़र नहीं आती| दोयम दर्जे का व्यवहार उसे आहत कर जाता है| हर कदम पर समाज का औरत वाला भाव उसे नीचा दिखाता प्रतीत होता है|    

बावजूद इसके चेतना के मन में समान्तर चलता रहा कि वो एक इंसान है औरत से एक कदम ऊपर...जहाँ ना औरत औरत होती है ...ना औरत से नीचे...ना पुरुष से ऊपर..बस वो एक इन्सान होती है। वो इस भावना को चेतन मन के भीतेरी कोने में कुलांचे भरती नदी की तरह महसूस करती है। पर बाहर से उसे परिवार के कदम से कदम मिलाना होता है। समाज की बनाई सड़क पर चलना होता है। वो कदम दर कदम चलाती है उस सड़क पर जो केवल औरतों से भरी है। वो सोचती है अगले चौराहे पर नई सड़क पकड़ लेगी जहाँ से कोई सड़क केवल इंसान की वाली होगी। लेकिन चौराहे पर भी उसे कोई  ऐसी सड़क नहीं मिलती|

चेतना की शादी के लिए रिश्ता आया था| उसी की कम्पनी के अहमदाबाद वाले दफ्तर में कम करता है रितेश| कोई कमी नहीं थी ,अच्छी कद-काठी ,उसी के बराबर कमाने वाला ,एक बहन एक भाई का छोटा परिवार ,चेतना की हाँ ने माता-पिटा को गति दे दी| अगली बैठक में तय हुआ था कि सगुन में क्या होगा ,कितना नकद, कितना सामान ,बरात की आवभगत ,रिश्तेदारों की मिलनियाँ ..इन सब चर्चाओं में पिता, चाचा,ताऊ और दादाजी की भागीदारी रहती| माँ बीच में ओत करके बैठती ज़रूर थी पर बोलती कुछ नहीं थी और चेतना.....चेतना का मन उबाल खाता| “ अरे ! मैं भी उसी ऑफिस की कर्मचारी हूँ ...उतनी ही तनख्वाह के साथ, फिर शगुन हम क्यों दें , क्यों दें नकद और सामान भी क्यों ...ये सब ताम-झाम....” अपनी माँ के बैठक से उठकर रसोईघर तक पानी लेने आने पर चेतना अपन उबाल को तीखे स्वरों में सामने रख देती और माँ का ठन्डे घड़े में लौटा डालते हुए ठंडा जवाब होता ये सब तो होता ही है ,लड़की वालों को इतना तो करना ही पड़ता है|”और चेतना का स्त्री मन पुकार करता ही मैं इंसान हूँ मुझे इंसान ही रहने दो....बैठक तक पानी ले जाते हहुए उसके सारे विचार ठन्डे पानी के गिलास में घुल जाते |

शादी हुई सब रीती-रिवाजों से भरपूर ....भले ही रितेश आधुनिक विचारों के थे पर कहीं ना कहीं चेतना के विचार टकरा ही जाते थे और बिना खनक किये टूट भी जाते थे|

ससुराल में देवर की शादी की तैयारी में उसे वैसी ही बैठकें मन्त्रणाएं सुनने को मिली कि क्या-क्या सामान में नहीं है वो वधु पक्ष से माँगा जा सकता है चेतना का मन तब भी उबला था| बैठक की ओट में खड़ी चेतना ने रितेश को धीरे से कहा था क्या ज़रूरत है सामान की, हमारे घर सब तो है|”

दुनिया की रीत के साथ चलना पड़ता है ,चेतु ! मैं भी कुछ नहीं कह पा रहा दादा-पापा के सामने!” पहली बार चेतना ने रितेश को भी अपनी तरह असहाय ही पाया था| स्त्री पुरुष की समानता की धौंकनी  चेतना के ह्रदय में और तेज हो गई थी|

घर परिवार में समाज के बने बनाए नियम चलेंगे री चेतना...तेरी कौन सुनेगा....चल तेरा बेटा होगा तब सोचना.....” चेतना के अन्तर्गत ने उसकी बुद्धि पर मुक्का मारते हुए कहा| वह  चौंक गयी अपने ही विचारों पर....कब बेटा होगा....कब बड़ा होगा...कब देखेगी... कब बदलेगी समाज को...

परिवार में , समाज में , मित्रों के घेरे में भी कईं बार ललचाई दृष्टि की शिकार हुई चेतना समझ ही नहीं पाई कि वो इंसान होने का अपना अभियान कब सफल बना पाएगी | कभी सोचती है ये परिवार वाले घर घुस्सू लोग क्या जानेंगे शिक्षित औरत का दर्द क्या होता है फिर सोचती है तो कौनसा दफ्तर वाले लोग उसे औरत होने का दर्जा दे रहे हैं |

यत्र नार्यस्तु  पूज्यन्तेका श्लोक वेदों में ही अच्छा लगता है जहां घर और समाज की कल्पना स्वर्ग-सी करते हुए नारी की पूजा करने को कहा जाता है | लेकिन कितने परिवारों में नारी की पूजा की जाती है | दफ्तरों में महिला कर्मचारियों  को दी जाने वाली विशेष सुविधाओं के फरमान कागजों में जारी किये जाते हैं लेकिन कितने आदेशॉन को वास्तविक कार्य में लाया जाता है | चेतना का अन्तर्द्वन्द्व अक्सर तेज होकर आँख के कोरों पर सिमट आता है जहां दो बूँदें कभी कोरों पर ही जैम जाती हैं तो कभी लुढ़क कर दामन भिगो देती हैं |

कहीं आराम नहीं है ,ना  घर में ना दफ्तर में | घर के उबाल को दफ्तर में ठंडा करने की कोशिश और दफ्तर के जंग को घर में शांत करने की कोशिश चेतना को इंसान बनाने कि पूरी कोशिश भी करती है |

दफ्तर करते-करते तल्खियों में जीने लगी है | वो अपने सहकर्मियों से कोई मदद नहीं चाहती औरत होने के नाम पर | कदम दर कदम चलकर वो ज़िम्मेदार पड़ पर तो गई है |  दूर से देखते हैं सब कि औरत है अब मांगेगी मदद ..कितना कर लेगी काम 5 बजे बाद भी ...बाल-बच्चे नहीं संभालना क्या इन्हें...| 6 बजे ...7 बजे....8 बजे...पर चेतना 12 बजे तक भी काम कर जाती है | सब फाइलें जो निपटानी थी | आज ही मेल आया था हेड ऑफिस से |

“ घर नहीं जाना मैडम चेतना ” पीछे से आवाज़ आई थी बॉस की |

“सर ! वो ...”

“ किसी को कह दिया होता...” ये विनम्रता थी या कमजोर दिखाने की पुरजोर कोशिश।

“ किसको...?” चेतना मन ही मन बोली पर आँखों से ही कह पाई |वो चाहती ही नहीं किसी की मदद लेना। इतना ज़रूरी भी नहीं था कल कर लेती | फी तुम्हीं कहते कि किया नहीं।

अब कुछ दिन से साढ़े पाँच बजे उठाती है चेतना अपना पूरा काम करके। फिर भी उस दिन बॉस ने बुलाया-“ मैडम आपके पास वाली सीट का दिनेश  बजे 9 तक बैठता है ! आप ही के विभाग का काम है ! अप उसकी मदद नहीं कर सकती ”

भौंचक्की है चेतना ! वो जानती है उनके मन कि बात कि वो जल्दी जाती है तो औरत है और देर से जाए तब भी औरत है | पर वो नहीं जानते कि 10 से 5 में पूरी शिद्दत के साथ खुद को झोंक कर अपने का काम को 5 बजे तक समेटती है। फिर भी बेहद संयत आवाज़ में कहती है –“ सर ! मैं तैयार हूँ दिनेश जी की मदद के लिए। 5 बजे से 9 बजे तक यानि कुल चार  घंटे ,मेरे हिस्से का आधा काम लूं तो दो घंटा मेरे काम का बढ़ा | तो मैं सात  बजे घर जाऊँगी और दिनेश जी भी सात बजे घर जायेंगे अपने बीवी बच्चों के बीच। वो कहीं ऑफिस पार्किंग में नहीं रुकेंगे ना ही पान की दुकान पर  ” बॉस खामोशी से सुन रहे थे।

सीट से उठते हुए चेतना बोल उठी “...और सर मैं कल से दिन में तीन बार ठेले से चाय पीने जाऊँगी ”ठहाका लगाकर बॉस हंसे थे पर मन के कोने में कहीं फांस चुभ गया था चेतना की गणना भरी बातों से।

पिछले सप्ताह पर छूट्टी पर थी। मीशू बीमार था। चार दिन  बाद ऑफिस पहुँची तो बॉस का बुलावा था।

 “...छुट्टी पर कैसे...कोई सूचना नहीं....कोई अर्जी नहीं ” वो ही फांस अटकी थी शायद।

“ सर ! बेटा बीमार था ..अस्पतालों के चक्कर...”

“ बहाना करती हो बेटे की बीमारी का..ऑफिस का काम नही करना तो मत करो....”

“...कोई माँ अपने बेटे की बीमारी का बहाना नहीं करती...” चेतना के अंदर की माँ शेरनी सी दहाड़ने लगी थी फिर वही संयत होकर वो सीट पर आकर बैठ गयी |

चेतना जानती है कि औरत को पुरुषों के साथ काम करते हुए खुद को तीन गुना साबित करना पड़ता है | भले ही औरतों के विकास के नाम पर या उंके सशक्तिकरण के नाम पर कोई दिवस मना लो, कोई साल ही मना लो या कितने ही सम्मानों से नवाज़ लो पर असलियत तो यह है कि वो तेज चलती औरत को अडंगी देकर गिराने से नहीं चूकता ये पुरुष समाज |

चेतना को बॉस ने बुलाया है आज चेंबर में | एक पर्चा थमा दिया है | छ: महीने के लिए उस गाँव वाले दफ्तर में भेजा है | चेतना ने कोई प्रतिक्रया नहीं की |

सीट पर आकर बैठी तो याद आया कि इस गाँव वाले दफ्तर में तो कोई  महिला कर्मी कभी भेजी ही नहीं गई क्योंकि यहाँ महिलाकर्मी के लिए टॉयलेट ही नहीं है | इसी बात पर चेतना से पहले कईं महिलाकर्मियों ने वहाँ जाने से मना कर दिया |

चेतना जानती है सब नियम क़ानून कि किसी कंपनी में महिला के लिए अलग टॉयलेट होना कितना ज़रूरी है | उसके लिए लंचरूम ना सही एक महिला कक्ष होना ज़रूरी है |

तो क्या वो मना कर दे बॉस को | “ चेतना ! 25 साल की इस नौकरी में अब तू ये कहेगी कि मैं औरत हूँ...नहीं जा सकती वहाँ..फिर तू तो औअरत से भी ऊपर बनना चाहती है ना...इंसान...”

जायेगी चेतना उस गाँव जो 80 कि.मी. दूर है....ना सही महिला टॉयलेट...ये तो दफ्तर का प्रबंधन जाने...इस समाज का पुरुष जाने....भारतीय वेदों का रचयिता जाने कि यत्र नार्यन्तु पूज्यन्ते...रमन्ते तत्र देवता...ये तो ईश्वर की बनाई एक कृति का दूसरी कृति के प्रति सम्मान है....अब कौन कितना   सम्मान करता है वो उसका मन | मुख्य सड़क पर बस से उतर कर दो  कि.मी. रेगिस्तानी रेत पर चल कर जाना..दिन भर धुल मिट्टी में रहना..महिला पुरुष का एक ही टॉयलेट में जाना उसे अखरता तो है पर...

उस दिन सब्जीमंडी में सब्जी लेते हुए दफ्तर यूनियन का नेता श्याम बिहारी मिला था। “ कैसी हो मैडम ! कैसा चला रहा है नया ऑफिस ! आपका नाम महिला उत्पीड़न समिति के सदस्य के रूप में आगे भेजा है | एक सर्कुलर भेजूंगा। चाहे तो आप इस्तेमाल कर लेना। ” और खी खी करके हंस दिया।

चेतना समझती है वो क्या चाहता है। औरत द्वारा पुरुष पर ये यौन शोषण वाला आरोप लगाना बहुत आसान होता है। वो जानती हैं कि इसे औरतें सीधी की तरह इस्तेमाल करती हैं। “नहीं ! नहीं ! वो सशक्त है...सशक्त पर्याप्त...वो इस्तेमाल नहीं करेगी ऐसे हथियार ..कभी नहीं..वो औरत नहीं है ...वो तो इंसान है...ना औरत से कम ना पुरुष से ज्यादा...”33 साल से उसके अन्दर की इंसान वाली नदी फिर से कुलाचें भरने लगती है।

इनपुट सोर्स : संगीता सेठी, प्रशासनिक अधिकारी, भारतीय जीवन बीमा निगम केंद्रीय कार्यालय, मुंबई 


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