गोपाल खरे नहीं बन सकते आप...  

गोपाल खरे नहीं बन सकते आप...  

फीचर्स डेस्क। इंसानियत मुरझा सकती है, किन्तु मरती नहीं। कहीं न कहीं, कोई न कोई उसे ज़िंदा रखना ही चाहता है। बात औरों के लिए बहुत छोटी-सी भी हो। मेरे लिए यह मनभावन है। शकुन देनेवाली। कायल बना देने वाली। ऐसे दौर में जब हमारे सारे जनप्रतिनिधि घोटालों के सरताज़ बन रहे हैं - गोपाल खरे, मुझे चौंकाते नहीं बल्कि भले मानुष और सच्चे भारतीय की तरह दिखते हैं, जिनकी कमी सभी को सालती है। 

गोपाल खरे रतलाम से आठ किमी दूर अमलेटा गाँव के मुखिया है और सरपंच भी। ये पहले करते हैं साइकिल रिपेयर फिर जाते हैं पंचायत। रोज सुबह 9.30 बजे गाँव स्थित दुकान पहुंचते हैं। यहां 10.30 बजे तक स्कूली बच्चों की साइकिल रिपेयर करते हैं। फिर पंचायत जाते हैं। छुट्टी के समय शाम 4 बजे फिर दुकान आते हैं और यदि बच्चों की साइकिल में कोई ख़राबी है तो उसे दूर करते हैं। वे रोज़ 25 से 30 बच्चों की साइकिल सुधारते हैं। अमलेटा ही नहीं डेढ़ से दो किमी दूर स्थित गांव के स्कूली विद्यार्थी भी साइकिल की मरम्मत कराने आते हैं। बच्चों की खरे से आत्मीयता हो गई है।

वे कहते हैं - ''मैं रिपेयर फ्री में क्यों नहीं कर सकता। बस यही संकल्प मन में आया और शुरू कर दी रिपेयरिंग। ऐसा करते हुए उन्हें पाँच साल हो गए। इतने साल में छुट्टी को छोड़कर ऐसा एक भी दिन नहीं रहा जब उन्होंने बच्चों की साइकिल ठीक नहीं की। मैं सरपंच रहूँ या न रहूँ लेकिन बच्चों से ऐसा लगाव हो गया है कि हमेशा फ्री में साइकिल ठीक करता रहूँगा।'' मैं आपको अमलेटा का देवता मानता हूँ खरे जी। देवता !

स्टोरी : जय प्रकाश मानस के टाइमलाइन से।

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