तुम्हारी भंवरों सी आदत...

तुम्हारी भंवरों सी आदत...

शिकायत भी किसी से हो तो मैं मुंह बंद रखती हूँ 

मेरे अपने विचारों से ही अब मैं द्वंद रखती हूँ ।।

तुम्हारी भंवरों सी आदत,नहीं कुछ काम आने की 

छिपा कर अब मै अपनी चाह का मकरंद रखती हूँ ।।

ठोकरो से मिली है सीख मुझको बच के चलने की

दिले जज्बात ऐसे हैं कि रिश्ते चंद रखती हूँ ।।

कि अपने आज मे जीने का हुनर सीख लिया है 

मै यादो की हवाओं की गति अब मंद रखती हूँ ।।

मेरे उकताए से जीवन में जब भी बारिशें होती

हृदय के खुश्क पन्नों पर मैं तब तब छंद रखती हूँ ।।

शक्ति वाजपेई, लखनऊ सिटी।


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