पार्ट -3 : दस साल का वनवास...

पार्ट -3 : दस साल का वनवास...

बेटा परसों की तैयारी कर ली तूने?

कैसी तैयारी माँ? मैंने माँ के अचानक पूछे गए सवाल पर रिएक्शन दिया।

"ले.. भूल गई, रंभा की शादी है ना परसों।", माँ ने याद दिलाते हुए कहा।

अरे हां.. हां माँ, मैंने अपने सारे कपड़े रख लिए हैं। रंभा, मेरे मामाजी की लड़की, जो मेरी हमजोली और अच्छी सहेली भी थी और पहली बार मेरे परिवार में प्रेम - विवाह हो रहा था। आज उसके प्रेम - विवाह करने से न जाने मुझे क्यों इतनी खुशी हो रही थी।

खैर शाम होते ही पापा भी आँफिस से आ गए और फिर मैं किचन में पापा के लिए चाय बनाने चली गई। चाय लेकर आई तो पापा ने पूछा, काॅलेज का पहला दिन कैसा रहा? "बहुत अच्छा रहा पापा", मैंने बताया।

कुछ देर तक पापा से काॅलेज के बारे में बातें की, थोड़ा टीवी देखा और उसके बाद किचन में मम्मी का हाथ बंटाने चली गई। आज भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच था। पापा क्रिकेट देख रहे थे। धोनी के सिक्सर लगाते ही बगल से सीटी बजाने और चिल्लाने की आवाजें आने लगी। ऐसा हमारे अपार्टमेंट में पहली बार हुआ। मैं समझ गई कि ये बगल वाले फ्लैट के लड़कों की आवाजें है। खैर पापा क्रिकेट में इतने लीन थे कि उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया क्योंकि वो भी धोनी के सिक्सर मारते ही, खुशी के मारे चिल्ला उठे थे। हम सबने डिनर किया और सोने चले गए। करीब बारह बजे रात पटाखें फूटने की आवाजें आने लगी, मैं समझ गई कि भारत जीत गया।

न जाने क्यूं, नीलेश की तरफ एक खिंचाव सा महसूस होने लगा था। जब तक उसको न देखूं, चैन न आता। अब तो काफी घुल-मिल गई थी उसके साथ। अब हर वक्त उसके दीदार की चाह लगी रहती। आलम ऐसा था कि अब क्लास रूम में, नीलेश के साथ बैठने के लिए मैंने सुमन को भी राजी कर लिया। सुमन ने तो मुझे अकेले में छेड़ना भी शुरू कर दिया था। वो कहती," देखिए ये वही लड़की है जो लड़कों से बात करने में कतराती थी और आज एक लड़के के साथ बड़ी सहजता से बैठ रही है। क्या कुछ खिचड़ी पक रही है, इन दोनों के बीच में।", जानने के लिए सुमन से जुड़े रहिए।

उसके ऐसा करने पर मैं, ऊपर से तो गुस्सा दिखाती लेकिन मन ही मन बहुत खुश होती थी। धीरे-धीरे निलेश का घर आना - जाना होने लगा। मम्मी - पापा दोनों उसे पसंद करने लगे थे। मम्मी ने तो उससे इतना लाड़ लगा रखा था कि कभी भी घर आता और मम्मी से चाय - पकौड़े की फरमाइश कर देता और मम्मी भी एक पांव पर उसके लिए वो चीजें बनाने लगती। अब अपने - पराये का फर्क मिट गया था।

नियत समय पर हम सब मामा जी के घर पहुंच गए और रंभा से मिलकर, मैं तो खुशी से फूले न समायी। लव मैरिज रंभा की हो रही थी लेकिन सबसे ज्यादा खुशी मुझे हो रही थी शायद मैं, रंभा में, अपना भविष्य देख रही थी। रंभा का पति आलोक बहुत ही अच्छे स्वभाव का था। मम्मी से तो इतना घुल - मिल गया कि जब मम्मी ने कहा, "बेटा कोई अच्छा लड़का, मेरी सपना के लिए भी बताइएगा।" इस पर उसने झट से, अपने फुफेरे भाई के बारे बता दिया जो अभी इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। शादी अच्छे से संपन्न हो गई। विदाई के समय सबकी आँखे नम हो गई लेकिन सबको इसी बात की खुशी थी कि लड़की अच्छे घर में गई है। दूसरे दिन हम वापस आ गए। हम जैसे ही घर वापस आए, निलेश ने दरवाजा नाॅक किया। मैंने दरवाजा खोला तो देखा उसके हाथ में सब्जी से भरा झोला था। मैंने हल्की मुस्कान दी और पूछा, " ये सब्जी किसका है?"

" डिटेक्टिव मैडम, पहले अंदर आऊँ कि यही खड़े - खड़े सारी जाँच - पड़ताल कर लोगी?," मुझे छेड़ते हुए बोला। इस पर पापा ने बोला, "आओ बेटा! अंदर आ जाओ, मैंने ही नीलेश को सब्जी लाने के लिए कहा था।"

समय बीतता गया, मेरे और नीलेश के बीच, दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया था। ये बात नीलेश को छोड़, सारी दुनिया को दिखाई दे रहा था लेकिन शायद नीलेश को इस बात का एहसास नहीं हो रहा था कि हमारे बीच दोस्ती से भी बढ़कर कुछ था। अगर कोई क्लासमेट उसे मेरे नाम से छेड़ता तो वह यही कहता, "ऐसा कुछ नहीं है.. हम बहुत अच्छे दोस्त हैं।" लेकिन यहां तो प्रेम का अंकुर पहली बार में ही फूट पड़ा था और इन तीन सालों में पल्लवित और पुष्पित भी हो चुका था। इंतजार बस इसी बात का था कि निलेश को कब, इस प्यार का एहसास हो। ये साल हमारे काॅलेज का आखिरी साल था, परीक्षाएं हो चुकी थी बस रिजल्ट आने का इंतजार था। घर में गाहे-बगाहे मेरी शादी के चर्चे होते रहते थे। एक दिन काॅलेज से आने के बाद, सीधे मेरे साथ घर में घुस आया और मम्मी को कहने लगा, "आंटी कुछ खाने को है तो मुझे दे दिजिए, बड़ी जोरों की भूख लगी है।"

"अरे हां .. हां बेटा देती हूं। आज मैंने आलू के परांठे बनाए थे, पांच मिनट रूक फटाफट तुझे गर्म - गर्म बनाकर देती हूं।" इतना कहकर मां परांठे सेंकने लगी।

क्यों? आज रमन ने खाना नहीं बनाया क्या? जो मेरे चार परांठे में से दो परांठे हड़पने आ गए।", मैंने निलेश की टांग खिंचते हुए पूछा।

"अरे हां.. उल्लू , रमन दो एक सप्ताह की छुट्टी लेकर अपने गांव गया है।

"हो गया बंटाधार," मैंने अपना सर पकड़ते हुए कहा।

इतनी देर में, मां गरम - गरम परांठे, दही और अचार के से सजी थाली निलेश को दे गई। "हे भगवान, ये मेरा ही घर है या किसी और का?" मैंने गुस्से से बोला। "अरे .. अरे.. थोड़ी देर क्या हुई तूने तो अभी से इस घर को किसी और का बना दिया।", मां ने नीलेश की तरफ देखकर कहा और फिर नीलेश और मां, मेरी ओर देखकर हंसने लगे।

"ये तेरा ही घर है। ये ले, गरम है, तू भी खा ले", मां ने गाल पर प्यार से चपत लगाते हुए मेरी थाली मुझे दे दी।

"मां के आंचल में शर्माते हुए मुंह छुपा लिया और फिर आंचल से बाहर मुंह निकालकर बोला, "मम्मी, आप हमेशा इसकी ही तरफदारी करती है।"

" ये भी तो अपना ही है, तुझे बहुत शर्म आती है इसके सामने।", मां ने कहा।

"परांठे कैसे बने हैं बेटा?"

"आंटी, आपके बनाये खाने का कोई जवाब नहीं है!", नीलेश परांठे का एक टुकड़ा मुंह में भरते हुए बोला।

"बेटा, तुझसे एक राय लेनी थी।"

"हां.. हां बोलिए ना आंटी, क्या बात है?"

"बेटा, एक लड़का साफ्टवेयर इंजीनियर है, अभी - अभी पुणे में ज्वाइन किया है उसने, कैसा रहेगा ये लड़का?" मां ने मेरी ओर देखते हुए कहा।

जाने मम्मी के दिमाग में क्या चल रहा था? मैं समझ नहीं पा रही थी।

"साफ्टवेयर इंजीनियर.. बहुत अच्छा है,आंटी.. किसके रिश्ते के लिए देख रही है?", निलेश ने पूछा।

"सपना के लिए, इस लड़के का रिश्ता आया है", मां ने तपाक से बोला और फिर मुझे और नीलेश के चेहरे के भाव को देखने लगी।

इतना सुनते ही मेरे चेहरे का रंग उड़ गया और मैं, वहां से उठने लगी।

"अरे सपना क्या हुआ बेटा, परांठा अच्छे नहीं लगे?", मां ने मुझे टोकते हुए कहा।

"न.. नहीं ऐसी बात नहीं है, मेरा पेट भर गया," इतना कहकर, मैं रसोई में प्लेट रखने चली गई और वही खड़ी होकर नीलेश की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी।

"नीलेश.. बोल बेटा कैसा रहेगा? सपना के रिश्ते के लिए ये लड़का!"

"जी.. अच्छा रहेगा आंटी, सपना के लिए।", निलेश बोला।

नीलेश का जवाब सुनने के बाद, मैं रसोई से अपने कमरे में चली गई।

खाना खाने के बाद निलेश कुछ देर बैठा और फिर चला गया।

मैं, बिस्तर पर लेटी हुई, तकिए को मुंह में दबाए रो रही थी। आज मुझे यकीन हो गया कि मैं, नीलेश से एक तरफा प्यार करती हूं। नीलेश मुझसे प्यार नहीं करता। तभी पीछे से माँ ने पीठ पर हाथ रखा और मैं, सकपका कर आँसू छुपाते हुए उठ बैठी, पर माँ से नजरें नहीं मिला पा रही थी अगर उसे पता चल गया तो। तभी माँ ने मेरा झुका हुआ चेहरा, अपनी हाथों से उठाकर अपने चेहरे के सामने कर दिया। अब मैं अपने आपको रोक नहीं पाई और फूट - फूटकर रोने लगी और कहने लगी, "माँ.. माँ .. वो.. वो.. मैं। बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन कुछ नहीं कह पाई।"

माँ ने मुझे शांत करते हुए कहा, "तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है बेटा! मैं सब जानती हूँ। तू नीलेश से बेइंतहा प्यार करती है इसलिए मैंने आज उसके सामने तेरे रिश्ते की बात छेड़ी, ताकि ये जान सकूं कि उसके दिल में तेरे लिए प्यार है कि नहीं। लेकिन शायद.." कहते हुए माँ का चेहरा मुरझा गया।

मैंने अपने आप को संभालते हुए और आँखे झुकाए हुए पूछा, "आपको कैसे पता चला कि मैं.. निलेश..।"

"मैं तेरी माँ हूं सपना और एक माँ को अपने बच्चे की हर बात पता होती है। तेरी आँखे सबकुछ कह जाती है बेटा! और मुझे तेरी आँखे पढ़ने की आदत है। मैंने भी नीलेश को अपने दामाद के रूप में ही देखा है। एक माँ - बाप.. जो गुण अपने दामाद में देखना चाहते हैं, वो सब उसमें है लेकिन नीलेश को शायद इस बात का एहसास नहीं है।"

क्रमशः............


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