बन्द हो हर हैवानियत अब

बन्द हो हर हैवानियत अब

दूरियां बढ गयी थी दिल की

हो चला था हवसी रे मानव ।

बलात्कार और चीत्कार का ,

आलिंगन कर रहा था दानव ।

देह ,देह से दूर हो गई , सबक मिल रहा याद करो ,

कितने बेबस बेचारे हो, अब खुद पर परिहास करो ,

कोरोना ने सिखा दिया है,

इंसानियत का पाठ नव ।

दूरियां बढ गयी थी दिल की

हो चला था हवसी रे मानव ।

सुनो आह हे मानव तुम, माँ धरती तुम्हे बताती है ,

मिट्टी मे मिला शरीर देख,मिट्टी भी रो - रो जाती है,

बन्द हो हर हैवानियत अब

कहता है पंछियों का कलरव ।

दूरियां बढ गयी थी दिल की

हो चला था हवसी रे मानव ।

पंचतत्व से बने हुए तुम, प्राणी तुम मे आत्म भी है,

धर्म कर्म और सद्बुद्धी है, तुम मे अनुपम ज्ञान भी है ,

ह्रदय संतुलन बना लो अब भी ,

उतर जाओगे पार भव ।

दूरियां बढ गयी थी दिल की

हो चला था हवसी रे मानव ।

इनपुट : आशा राय, लखनऊ सिटी।


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