असली चेहरा : खुद के अस्तित्व को पहचानो...

एक औरत अपने चेहरे पर कई मुखौटे लगाई रहती है। उन मुखोटों के पीछे अपनी खुशी छुपा लेती है। पर कब तक और क्यों? एक बार ये नकली मुखौटा उतार कर देखिए । रेखा मित्तल की इस रचना को पढ़िए
असली चेहरा : खुद के अस्तित्व को पहचानो...

फीचर्स डेस्क। कल रात से ही तृप्ति का मन बहुत परेशान था। आखिर तुषार का सच सामने आ ही गया ।कब तक एक झूठ से जिंदगी चलती रहेगी ?नकली मुखोटे के पीछे से आज असलियत सामने आ ही गई ।अपने रिश्ते को बचाने के लिए तृप्ति ने बहुत मेहनत की । परंतु आज उसको किसी फैसले पर पहुंचना ही था। रोज एक नकली मुखौटा लगाए जिंदगी नहीं जी सकती।

 "मुझे नहीं जीनी ऐसी जिंदगी !"तृप्ति  तमतमाते हुए बोली।

" क्या हुआ ऐसा ?,यही तो बोला है। घर परिवार संभालो ।अच्छी नौकरी तो मैं aaकर ही रहा हूं । मां भी तो यही चाहती है"तुषार भी गुस्से में बोल रहा था।

"मैंने डॉक्टरी की पढ़ाई बहुत मेहनत से की थी । मेरे पिताजी ने बैंक से लोन लेकर मुझे डॉक्टरी की पढ़ाई कराई है। मैं स्वतंत्र विचारों वाली स्वाभिमानी लड़की हूं। मैं चाहती हूं कि मैं हर तरीके से अपने परिवार को सहयोग दूं।" मैं लगातार बोले जा रही थी। आंखों से आंसू बह रहे थे।

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डॉक्टर बनकर समाज के लिए कुछ करना बचपन से ही मेरा सपना था।मैंने पढ़ाई करते हुए शपथ ली थी कि मैं मानव हित के लिए कार्य करूंगी। तुषार का परिवार नहीं चाहता था कि तृप्ति  अपने करियर में कुछ आगे नया करें। तुषार तो अभी भी अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। मैंने तुषार को समझाने की बहुत बार कोशिश की। परंतु तुषार के लिए मेरा करियर कुछ मायने नहीं रखता था।आज तृप्ति को अपने लिए फैसला करना ही था ।

बहुत सोच-विचार के बाद आज  मैं दृढ़ निश्चय कर चुकी थी ।मैंने अपनी एक अच्छी बहू का मुखौटा उतारा और चल दी एक नई मंजिल की ओर । मुझे अपनी अस्मिता और  स्वाभिमान के साथ जिंदगी जीनी थी।मुझे अपने लिए और समाज के लिए कुछ ना कुछ कार्य करना ही था। आज मेरी आंखों में एक नई चमक थी।

 सच में हम सब कई बार अलग-अलग मुखोटे लगाए वही करते हैं जो दूसरे हम से अपेक्षा करते हैं। हम जो करना चाहते हैं उसको करने के लिए हमें नकली मुखौटा उतारना ही पड़ेगा ।तृप्ति की तरह हमें भी अपनी मंजिल तलाशनी ही होगी। 

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इनपुट सोर्स: रेखा मित्तल

पिक्चर सोर्स: गूगल      


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