जज्बे को सलाम : सपनो के लिए किसी पर आश्रित होना जरूरी नहीं, पढ़ें उम्मुल खेर के संघर्ष की कहानी

अपने सपनो के लिए किसी पर आश्रित नही होना चाहिए। सपने आपके हैं तो उसे पूरी करने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है।और अपने सपनो की उड़ान भरने वाली वो महिला हैं उम्मुल खेर जो कि दिव्यांग हैं पर उनकी दिव्यगता का असर कभी भी उनक सपनो की उड़ान को कम न कर पाया ।जानतें हैं हमारी प्रेरणा उम्मुल खेर की जीवन की संघर्ष की कहानी।
जज्बे को सलाम :  सपनो के लिए किसी पर आश्रित होना जरूरी नहीं,  पढ़ें  उम्मुल खेर के संघर्ष की कहानी

फीचर्स डेस्क। कई लोग जिंदगी में आने वाली परेशानियों से परेशान हो जाते हैं और सोचते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यों होता है?लेकिन अगर आपको पता चले कि दुनिया मे ऐसी भी कई महिलाएं हैं जो जिंदगी में आने वाली परेशानियों से न सिर्फ लड़ती हैं बल्कि औरों को भी उत्साहित करती हैं कि चाहे जीवन मे कितनी भी परेशानियां क्यो न आएं खुद पर विश्वास करना कभी नही छोड़ना चाहिए।औऱ अपने सपनो के लिए किसी पर आश्रित नही होना चाहिए।सपने आपके हैं तो उसे पूरी करने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है।और अपने सपनो की उड़ान भरने वाली वो महिला हैं उम्मुल खेर जो कि दिव्यांग हैं पर उनकी दिव्यगता का असर कभी भी उनक सपनो की उड़ान को कम न कर पाया ।जानतें हैं हमारी प्रेरणा उम्मुल खेर की जीवन की संघर्ष की कहानी।

उम्मुल की दिव्यांगता ने छीन लिया बचपन


उम्मुल बचपन से ही दिव्यांग हैं।इसलिए उन्होंने वो बचपन नही जिया जिसे और बच्चे जीते हैं।लेकिन उम्मुल को इस बात का कोई गिला नही ।उम्मुल को बचपन से ही हड्डियों से संबंधित बीमारी है जिसे अजैने बॉन डिसऑर्डर कहते हैं।ये बीमारी हड्डियों को कमजोर बना देती है और उसे मजबूत नही होने देती।जिस बीमारी के चलते उनको व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा।लेकिन वो कभी घबराई नहीं और न ही इनने हिम्मत ही हारी।इन्होंने अपने विश्वास और अपनी तैयारी के चलते यू .पी. एस .सी का एग्जाम दिया और पहले ही एटेम्पट में उसे क्लियर किया और उनकी सपनो की उड़ान के पंख ऐसे फ़ैले कि उनकी इस उड़ान को हम महिलाएं सलाम करती हैं।

बीमारी ने कभी उनका पीछा न छोड़ा

उनकी बीमारी उनको शारीरिक  रूप से लगातार कमजोर करती रही ।उनकी हड्डियां इस कदर कमजोर हो गईं कि वो कही थोड़ा सा भी गिर जाती तो उनकी हड्डी टूट जाती।और उनको गहरे दर्द का सामना करना पड़ता।मात्र 18 साल की उम्र में उनके 15 फेक्चर हुए जिससे वो चलने में भी असमर्थ हो गईं और  व्हील चेयर  ने ही उनके कदमों का काम किया।लेकिन वो मन से दिव्यांग नही थी ।उन्होंने शरीर की दिव्यगता को मन में हावी नही होने दिया ।और ठान लिया कि अपने सपने जरूर पूरे करेंगी।

बचपन से ही गरीबी से था गहरा नाता

उम्मुल ने बचपन से ही गरीबी देखी थी ।उनके पिता फुटपात में मुंगफली बेचा करते थे।और उनका घर उनकी इसी कमाई से चलता था।उनका पूरा परिवार दिल्ली में निजामुद्दीन इलाके के पास जो झोपड़पट्टीयाँ थी वहां रहता था।जिसमे बरसात का पानी भर जाता था और उनका पूरा परिवार ठीक से सो भी नही पता था।गर्मी और सर्दियों के मौसम में भी उनको भारी प्रोब्लेम्स का सामना करना पड़ता था।ऐसे हालातों में 2001 में उनको बेघर होना पड़ा क्योंकि उनकी झोपड़ी टूट गई थी।जिसके बाद वो त्रिलोकी पूरी में बसे।अपने घर के हालातों को देख कर उनको ये बात समझ आ गई कि अगर सही जीवन चाहिए और ऐसे जीवन से समझौता नही करना है तो पढ़ाई करना बेहद इंपोर्टेंट  है।लेकिन उम्मुल की फैमिली की फाइनेंशियल हालात इतनी खराब थी कि वो उम्मुल को पढ़ना नही चाहते थे।लेकिन उम्मुल के मन मे फिर भी पढ़ने की कसक जिंदा थी।

माँ ने बचपन मे ही छोड़ दिया था साथ

मुश्किलों का दौर अभी खत्म भी न हुआ था कि उनकी माँ ने उनका और जिंदगी का साथ ही छोड़ दिया।उनकी माँ उनकी ताकत थी और उनके हर काम मे उनके हर फैसले में उनका साथ देती थी।मुश्किलें तब और बढ़ गईं  जब उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली।उनकी सौतेली माँ के आ जाने से घर का माहौल और ज्यादा खराब हो गया और उनकी सौतेली माँ उनके साथ एडजेस्टमेंट नही कर पाईं जिसके कारण  उम्मुल को घर छोड़ने  पर मजबूर होना पड़ा।उनने किराये का घर लिया और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगीं।ट्यूशन से जो भी रुपये वो कमाती थी  उससे बचत कर के उन्होंने पढ़ाई की और ये डिसाइड किया कि वो आई .ए. एस का एग्जाम देंगी और कुछ कर के दिखाएंगी।

पढ़ाई में थी हमेशा से अव्वल-


उम्मुल हमेशा से ही पढ़ाई में बहुत होशियार थीं।उन्होंने अपनी 5 वीं तक कि पढ़ाई आई टी ओ में स्टैब्लिश एक दिव्यांग स्कूल में की।ओर 8 वीं तक कि पढ़ाई करकरडूमा के अमर ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट में की।वो पढ़ाई में हमेशा से ही अव्वल आती थीं।8वीं में उनके बहुत अच्छे मार्क्स आये थे जिसके कारण उनको स्कोलरशिप भी मिली ।जिसकी वजह से वो अपने आगे की पढ़ाई अच्छे स्कूल में कर पाईं।वो बहुत मेहनतीं थी जिसके चलते उनके 10वीं में 91 परसेंट ओर 12वीं में 90 परसेंट आये।ये उपलब्धि उनके लिए मामूली नही थी ।उनकी मेहनत लगन के चलते उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई दिल्ली यूनिवरसिटी से की।उन्होंने अपनी पढ़ाई के चलते बच्चों को ट्यूशन पढाना नही छोड़ा।क्योकि वो नही चाहती थी कि उनकी तरह योग्य बच्चों को उनकी ही तरह पढ़ाई के लिए स्ट्रगल करना पड़े।

यू .पी .एस. सी की सफलता ने चूमे उनके कदम


पढ़ाई का शौक कब जुनून बन गया पता ही नही चला और उन्होंने 2016 में यू.पी.एस.सी का एग्जाम दिया।और 1st अटेम्प्ट में ही 420वीं रैंक प्राप्त की।ऐसी मुश्किल लड़ाई उन्होंने खुद अकेले ही लड़ी ।माँ के जाने के बाद उनकी फैमिली ने उनको पूरी तरह छोड़ दिया लेकिन उनको अपनी फैमिली से कोई शिकवा गिला नही है।

उम्मेल खेर बनी हम महिलाओं की प्रेरणा स्रोत

उम्मुल खेर आज हम महिलाओं की प्रेरणा हैं।क्योंकि ऐसे मुश्किल हालात किसी को भी तोड़ने के लिए काफी हैं लेकिन उम्मुल ने हिम्मत नही हारी।हमेशा पाजिटिविटी का हाथ थामे चलती रहीं मंज़िल की तरफ।और  आई.ए. एस बन कर हम महिलाओं की ही नही सभी की प्रेरणा बन गईं जो मुश्किल हालातो से हिम्मत हार जाते हैं और कोई गलत कदम उठाते हैं ।उम्मुल खेर को हमारा सलाम

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