माँ की बातें आज भी याद हैं: क्योंकि माँ कुछ कहती ही नहीं

इस कविता के माध्यम से अगर आप मेरे भावों को महसूस कर पाईं तो अपने द्वारा लिखी कविता को सार्थक समझूँगी।
माँ की बातें आज भी याद हैं: क्योंकि माँ कुछ कहती ही नहीं

फीचर्स डेस्क। माँ के बारे में कुछ लिख पाऊँ इतना सामर्थ नहीं मुझमें क्योंकि माँ क्या होती है उसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है लेकिन कुछ शब्दों को मैं कविता में पिरो कर आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ और इस कविता के माध्यम से अगर आप मेरे भावों को महसूस कर पाईं तो अपने द्वारा लिखी कविता को सार्थक समझूँगी।

" मुझे माँ की याद बहुत सताती है,
दिल मे कुछ मीठा सा दर्द जगाती है,
खो जाती हूँ उन पुरानी यादों में,
जो सहेज रखी हैं मैंने बचपन की तस्वीरों में,
आज अपना बचपन मैं अपने बच्चों में देखती हूँ,
क्योंकि अब मै खुद माँ जो बन गई हूँ,
ज़िद जब मैं करती थी टॉफी की,
खुद नही खाती थी पर मुझे दिलाती थीं,
और मुझे लगता था कि माँ को पसंद नही ,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही ।

जब चोट मुझे लग जाती थी ,
तो माँ भागी भागी आती थी,
अपने खुरदुरे हाथो से मरहम मुझे लगती थीं,
और मुझे लगता था कि माँ को पीड़ा नही होती ,

क्योकि
माँ कुछ कहती ही नही।

मेरे जन्मदिन में माँ, गुलाबजामुन बनाती थी,
और मै उनको बड़े चाव से खाती थी,
और सोचती थी कि माँ ये शायद खाती ही नही,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही।

जब मेरे एग्जाम होते थे तो,
माँ ही सारा काम निपटाती थी,
और  मुझे लगता था कि माँ को थकान नही होती,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही।

जब हम बहनें खेलती थी खेल खिलौने,
तब माँ खाना बनाती थी ,
और मुझे लगता था कि माँ को खेलना पसंद नही,

क्योंकि 
माँ कुछ कहती ही नही।

जब आ रहा होता कोई धारवाहिक,
और हम सब देखने बैठ जाते थे,
तब मुझे लगता था कि माँ को धारवाहिक भी पसंद नही,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही।

हम सब सहेलियाँ जब घूमने फिरने जाती थी,
अपनी गुल्लक से माँ जब 500 का नोट थमाती थी,
तब मुझे लगता था कि माँ को घूमना भी पसंद नही,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही।

हम  घर वाले बैठ जाते जब हँसी ठहाका करने,
और माँ बाद के पीछे के कामों को निपटाती थी,
और मुझे लगता था कि माँ को हँसी मजाक भी पसंद नही,

क्योंकि
माँ कुछ कहती ही नही।

पर अब सब समझती हूँ,
क्योंकि इन सब बातों से मैं भी गुजरती हूँ,
माँ को सब था पसंद,
पर अपनों की खातिर उसने छोड़ दिया था सब आनंद,
आज जब ये सब कुछ मेरे साथ भी गुजरता है,
तब मेरे बच्चे भी सोचते हैं कि ये सब कुछ माँ को तो पसंद ही नही,

क्योंकि
मै भी उनसे कुछ कहती ही नही।"

नेहा गोस्वामी


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