मेरे हिस्से की माँ

उस दिन माँ को बुखार था तो जुस्टिना ऑफिस से जल्दी घर जाना चाहती थी। वो कागज़ पर अर्जी लिखकर उस नई अफसर के सामने खड़ी हो गई। “ माँ आपके साथ रहती है ? ” उस सांवले रंग की अफसर ने जुस्टिना को प्रश्न किया जो अक्सर इस समाज का प्रश्न हो जाता है फिर नलिनी ने खुद को
मेरे हिस्से की माँ

फीचर्स डेस्क। जब से ऑफिस में नई कवयित्री मिज़ाज अफसर नलिनी मैम आई हैं ना तब से जुस्टिना का हौसला बुलंद ही हुआ है। सात भाई बहन में सबसे छोटी बेटी जुस्टिना ना जाने किस भावुकता में माँ को अपने घर ले आई थी। बस तब से माँ का मन ही नहीं किया कि वो किसी और बच्चे के यहाँ जाए। जुस्टिना के ह्रदय में एक नरम दिल बसता था इसलिए वो परेशान होकर भी माँ को छोड़ना नहीं चाहती। भले ही वो खुद ऑफिस की नौकरी करती है, दो बच्चों को संभालती है, उसके दो बहनें और तीन भाइयों की पत्नियों में से कोई भी नौकरी नहीं करता लेकिन माँ को संभालने के नाम पर सब पीछे क्या हटे, व्यवहार ही ऐसा रखा कि माँ एक बार जुस्टिना के पास आई तो वापिस जाने की इच्छा ही नहीं रखी।

उस दिन माँ को बुखार था तो जुस्टिना ऑफिस से जल्दी घर जाना चाहती थी। वो कागज़ पर अर्जी लिखकर उस नई अफसर के सामने खड़ी हो गई।

“ माँ आपके साथ रहती है ? ” उस सांवले रंग की अफसर ने जुस्टिना को प्रश्न किया जो अक्सर इस समाज का प्रश्न हो जाता है फिर नलिनी ने खुद को चिकोटी काटी कि आजकल नारी बराबरी का हक़ रखती है तो बराबरी का कर्तव्य क्यों नहीं ? 

जुस्टिना ने नलिनी मैम को कतरा-कतरा बताया तो नलिनी मैम अपने शायराना अंदाज़ में बोल उठी –

“ किसी के हिस्से में मकां आया

किसी के हिस्से में दुकां आई

मैं घर में सबसे छोटी थी

मेरे हिस्से में माँ आई ”

जुस्टिना की आँखों में यह शायरी सुनकर चमक आ जाती है। वो चंद घड़ी उस अफसर के सामने बैठ कर सुस्ता लेती है और कहती है “ आज से पहले मुझे किसी ने नहीं सुनाई ऐसी कविता, ऐसा लगता है जैसे कि मुझ पर ही लिखी हो, कहीं आपने तो नहीं लिख दी मुझे देखकर मैम ! ”

नलिनी हंस कर कह देती है- “ नहीं ! नहीं ! ये तो प्रसिद्ध शायर की पंक्तियाँ है ” नलिनी उदास जुस्टिना के सामने अपनी लिखी पंक्तियां भी सुना देती है

“ माँ पेड़ की छाँव जैसे प्यार का हो गाँव

माँ तुमसे जीवन है नहीं कोई आहत है ”

 नलिनी मैम के पास बैठ कर उदास जुस्टिना को और उत्साह आ जाता है और आजकल वो माँ का ज्यादा ख्याल रखने लगी है।

“ ला माँ ! आज सिर में तेल डाल दूं ” सरसों के तेल की गर्म कटोरी कपडे से पकड़े हुए माँ की चारपाई पर बैठ जाती है।

“ न री जुस्सी ! आज मुझे ज़ुकाम है फिर कहीं तुझे भी ना हो जाए तुझे अपने बच्चों का भी ध्यान रखना होता है ”

“ कुछ नहीं होता माँ !” मैं नाक दुपट्टे से ढक लूंगी।

“ हट ! हट ! दूर हट ! दूसरे कमरे में जा ” देबू माँ जुस्टिना को ढूंढते हुए चला आया तो माँ ने झटक दिया।

“ इनको मेरे कमरे में मत लाया कर जुस्सी ! बूढ़ी काया है , ना जाने कौनसे कीटाणु घूमते हैं इसमें ” माँ समझाती है तो जुस्टिना कह उठती है –“ तू भी ना माँ ! क्या-क्या सोच लेती है ”

जुस्टिना सर पर तेल लगाते हुए सोचती है जब बचपन में मुझे ना जाने कितनी बार ज़ुकाम हुआ होगा तब माँ ने क्या मुझे दूर किया होगा ? पर जुस्सी खुद ज़ुकाम की स्थिति में अपने बच्चों को दूर रखती है। माँ अपने बच्चों का कितना ध्यान रखती है,पर क्या बच्चे अपनी माँ का इतना ध्यान रख पाते हैं ?

माँ को उस दिन बुखार था। बड़े भैया मोटर साइकिल पर अपनी 6 साल की बेटी मनु को बैठा कर लाए थे। माँ को ताप में देख कर उन्होंने मनु को दूसरे कमरे में भेज दिया था फिर खुद भी दो फुट की दूरी बनाए खड़े रहे और जल्दी से मुड़ कर चल दिए। चलते हुए जुस्टिना कहने लगे –“ देखो ! माँ को कोलेरा है , मैंने डॉक्टर एक पर्चे में पढ़ लिया है। तुम भी दूर रहो। ”

जुस्टिना जाते हुए भैया की पीठ देख रही थी। सोचने लगी यह वही भाई है ना जिसके बचपन में चेचक निकलने पर माँ सारा दिन कमरे के दरवाजे पर पहरा देती थी और हम भाई बहनों को किस मुस्तैदी से दूर रखती थी। आखिर उसे हमारा भी तो ख्याल था, कितनी होशियारी से अनपढ़ माँ ने हमें क्वारेंटाइन किया था। उधर भैया को गरम काढ़े, मुनक्के से शरीर को ताप देकर संक्रमण को बाहर निकाला था, सफ़ेद चादर बिछाकर त्वचा से झड़ते घावों को बारीकी से मुआयना किया था, नीम के पत्तों का बंदनवार कमरे के दरवाजे पर बाँध कर खुद माँ नीम के पानी से नहाती लेकिन घर के किसी भी सदस्य को अन्दर नहीं आने देती। ये क्वारेंटाइन ही तो था। आज जुस्टिना कोरोना वायरस की महामारी के दौर में माँ के प्रबंधन के बारे में सोच रही थी।

उसने अपनी नई अफसर नलिनी मैम को माँ के हालात के बारे में बताया तो वो बोली –“ अरे जुस्टिना ! तुम क्वारेंटाइन लीव क्यों नहीं ले लेती। अपने मैनुअल में है कि घर के किसी सदस्य को संक्रमण वाली बीमारी हो तो छुट्टी ले सकता है। ”

जुस्टिना जानती थी, उसने अपनी नौकरी के प्रशिक्षण काल में पढ़ा था लेकिन कभी ऐसा काम ही नहीं पड़ा। उसे मालूम है कि क्वारेंटाइन शब्द लैटिन से लिया गया है जिसका अर्थ है “चालीस” पुराने जमाने में जिन जहाज़ों में किसी यात्री के रोगी होने अथवा जहाज पर लादे माल में रोग प्रसारक कीटाणु होने का संदेह होता था तो उस जहाज को बंदरगाह पर चालीस दिन ठहरना पड़ता था। ब्रिटेन में प्लेग को रोकने के प्रयास के रूप में इस व्यवस्था का आरम्भ हुआ। क्वारेंटाइन के समाप्त होने तक जहाज पर पीला झंडा फहराता रहता था। उसके बाद अलगअलग बीमारियों में क्वारेंटाइन समय दस,पन्द्रह या बीस कर दिया गया।

नलिनी उसे बताना चाह रही थी कि आजकल तो ईमेल पर आने वाले मेसेज को भी क्वारेंटाइन किया जाता है। उसकी भी सेटिंग होती है, कभी 40 दिन, कभी 20 दिन तो कभी 15 ही दिन। नलिनी खुद सोच कर ही हंस दी और जुस्टिना को ऑफिस की सीढियाँ उतरती देखती रही जब तक वो ओझल नहीं हो गई। 

जुस्टिना उस दिन घर गयी तो पूरे 10 दिन ऑफिस ही नहीं गई। माँ के सिरहाने बैठी तो वैसा ही पहरा दिया जैसा माँ बचपन में हम बच्चों के बीमार होने पर दिया करती थी।

माँ का हाथ ताप में भी जुस्टिना के सर की तरफ उठता था, उसे आशीर्वाद देना चाहता था। जुस्टिना को रह रह कर नलिनी मैम की कविता की पंक्तियाँ याद आती थी।   

आज जुस्टिना इस दौर में सोच रही थी माँ को क्वारेंटाइन ही तो किया था और खुद को भी,घर रहकर, स्टे एट होम।

जुस्टिना ने भी मुस्तैदी से माँ को संक्रमित बीमारी से ठीक कर लिया था। जब वो ऑफिस पहुँची तो नलिनी मैम अपनी सीट पर बैठी उसका इंतज़ार ही कर रही थी। मशीन पर अंगूठा लगाकर उसने अपनी उपस्थिति जताई तो नलिनी मैम ने अपनी ताली जुस्टिना के हाथ पर बजाते हुए कहा –“ मेरे हिस्से में माँ आई ” और दोनों हंस दी।

आज मदर्स डे पर पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है और जुस्टिना को माँ का कवारेंटाइन, नलिनी मैम की कविता और माँ का चेहरा सब यादों में गडमगड हुए जा रहा है। माँ के कवारेंटाइन प्रबन्धन को सलाम करने को मन कर रहा है। माँ तुझे सलाम !

संगीता सेठी, प्रशासनिक अधिकारी केंद्रीय कार्यालय, मुंबई।   


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