धुएँ के गुबार में फँसी जिन्दगी

नशा एक बुरी लत है। कोई शौक से नही करता। पर कई बार जीवन की कड़वी सच्चाई से पीछा छुड़ाने के लिए चिंताओं को धुएं में उड़ाना किसी किसी के लिए हो जाता है जरूरी। पर हम आपको ये ही सलाह देंगे कि किसी भी तरह के नशे से दूर रहे। जीवन की एक कड़वी सच्चाई को पढ़े माधुरी मिश्रा की इस कहानी के जरिए।
धुएँ के गुबार में फँसी जिन्दगी

फीचर्स डेस्क। हरिया और बसंती के विवाह को लगभग  8 वर्षों का समय होने को आया । पहले कुछ बरस का समय तो विवाह के शुरुआती खुशनुमा दिनों की तरह बीत गया । हरिया मजदूरी का काम करता था और बसंती घर -बार का काम निपटाने के बाद अपने घर के बाहर की थोड़ी जमीन में , मौसम के अनुरूप सब्जियां आदि बोने और उन पेड़ - पौधों की सेवा करने में बिता देती थी ।

अभी बसंती का मन लगाने के लिए एक छोटी बिटिया शालू भी आ गई थी । उसका वह पूरी तरह ख्याल रखती और उसके तथा हरिया के खाने -पीने का पूरा ध्यान देती । बसंती के दिलो - दिमाग में एक सपना यह पनप रहा था कि वह भले ही ना पढ़ - लिख पाई हो , पर अपनी बेटी शालू को जरूर पढ़ाएगी । जब शालू छः बरस की होने को आई , वह अक्सर हरिया से उसे स्कूल भेजने की बात करती । वह हँस कर टाल देता कि ऐसी क्या जल्दी पड़ी है ,भेज देंगे ।

जब बसंती ने देखा कि हरिया शालू को स्कूल भेजने के मामले में टालमटोल ही करता जा रहा है , तो उसने भी बहस करनी शुरू कर दी । एक दिन तो हद हो गई । उसकी इसी बात पर हरिया ने उसकी पिटाई कर दी और कहा ----- " खुद क्यों नहीं कमाती , क्या मैंने ही सारे घर की जिम्मेदारी ले रखी है ? " बात बसंती के दिल की गहराइयों में उतर गई । उसने आस - पड़ोस के दो - चार घरों में चौका - बर्तन का काम शुरू कर दिया और साथ ही मानसिक तनाव की वजह से नशे की लत भी पाल ली । कुछ दूर पर उसकी एक मुँहबोली बहन रहती थी , जिसके घर जाकर वह दो - चार बार हुक्के का कश लगा आई थी ।

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अब तो धीरे - धीरे उसकी यह बान ही पड़ गई थी और उसने अपने लिए घर में भी एक हुक्का लाकर रख लिया था और जब तनाव में होती , तो धुएँ के गुबार में अपने सारे गम बहा देने की कोशिश करती ।

शालू अपनी माँ का हुक्का कभी -कभी छुपा कर रख देती थी , पर जब माँ जोर - जबर्दस्ती करती तो जबरन उसे हुक्का लाकर देना ही पड़ता । अब उसने मन में यह तय कर लिया था कि चाहे जो हो , वह अपनी शालू को पास के स्कूल में दाखिला दिला कर ही दम लेगी । बसंती के मन के जज्बात , उड़ते हुए धुएँ के साथ ही इन शब्दों के रूप में बह निकले -

" अबकी बरस मेरे भैया को बाबुल , सावन में दीजो भिजाय रे " और यह गाते -गाते आँखों से बहते हुए आँसुओं के साथ शालू को उसने कसकर अपनी बाँहों में भींच लिया--!!!!!!

नोट - मुश्किलें चाहे कितनी बड़ी हो किसी भी नशे से दूर नही होती। नशे से दूर रहें।

जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराते हुए हम फिर एक नई कहानी के साथ उपस्थित होंगे। तब तक जुड़ी रहे हमारी  आपकी अपनी वेबसाइट  www.focusherlife.com से।

इनपुट सोर्स -   माधुरी मिश्रा

पिक्चर सोर्स -गूगल


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