एक अधूरी कहानी : पीर पराई...

एक अधूरी कहानी : पीर पराई...

फीचर्स डेस्क। मानसी और जयन्त बचपन से साथ-साथ पढ़े थे। एम बी ए की पढ़ाई के बाद मानसी ने जाॅब करली थी ऊधर जयन्त ब्रेक लेकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था। दोंनो की दोस्ती जब प्यार में बदली तो परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी तय कर दी गई। उनकी शादी को सिर्फ एक हफ्ता ही बचा था कि यू पी एस सी का रिजल्ट निकला और जयन्त की काफी अच्छी रैन्क आने के कारण उसका आई ए एस प्रौपर में चयन हो गया था। दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था कि एक दिन जयन्त के चाचा जी घर आये और शादी की खातिरदारी से लेकर दहेज की एक लम्बी लिस्ट थमाकर यह कहकर चले गये कि अब तो आपकी बेटी की शादी एक आई ए एस से होने जा रही है तो आपको उस स्टैंडर्ड को ध्यान में रखकर शादी करनी होगी, वगैरह वगैरह। मानसी को जब यह पता चला तो.... उसे हैरानी के साथ साथ गुस्सा भी बहुत आया।

किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए फाइव स्टार में शादी के साथ मँहगी गाड़ी और आधुनिक घर-गृहस्थी के तमाम सामानों का इंतजाम करना संभव नहीं होता है। मानसी के घर में सबके चेहरे पर चिंता के भाव थे । शादी के कार्ड भी बँट चुके थे, कुछ नजदीकी मेहमान आ भी चुके थे। ऐसे में शादी होगी या नहीं ,यह अनिश्चिता और बन गई थी।

उस दिन जयन्त ने कई बार मानसी को काॅल किया पर जवाब न मिलने पर वह खुद मानसी के घर आ पहुँचा। घर का माहौल देखकर वह समझ गया कि कुछ तो गड़बड़ है। फिर बात करने के लिए वे दोनों ऊपर मानसी के कमरे में चले गये।

" कुछ तो बताओ, हुआ क्या है? " मानसी को नाराज देख जयन्त ने उसे मनाने की कोशिश की।

"बनो मत, जैसे तुम्हें कुछ पता ही नहीं है " मानसी ने उसका हाथ झटक दिया।

" सच में मुझे कुछ नहीं पता " जयन्त झल्ला कर बोला।

मानसी ने चाचाजी की सारी बातें जयन्त को बता दीं। अब हैरान होने की बारी जयन्त की थी। उसने अपनी सफाई में कहा," देखो, मुझे नहीं मालूम कि उन्होने ऐसा क्यों और किसके कहने पर किया। लेकिन हाँ जबसे मेरा सलेक्शन हुआ है , रोज-रोज

बधाई

देने वालों का घर में तांता लगा रहता है। एक से एक बड़े और अमीर लोग आते रहते हैं, कुछ लोग तो रिश्ते भी कराने पर तुले हैं लेकिन मैंने साफ मना कर दिया है।"

"बिल्कुल झूठ , तुम्हारी जानकारी के बिना कोई इतनी बड़ी बात कैसे कह सकता है?" मानसी का गुस्सा चरम पर था।

"तुम जानती हो ,स्वीटहार्ट कि मुझे किसी बड़ी गाड़ी या और किसी चीज का मोह नहीं है।दो साल की ट्रेनिंग के बाद मेरे पास खुद की लाल बत्ती वाली सरकारी गाड़ी होगी जिसके आगे इन गाड़ियों की कोई वैल्यू नहीं है।" जयन्त ने उसे शांत करने की कोशिश की।

"फिर भी, सोचने वाली बात है कि चाचाजी ने ऐसा किसके कहने पर किया।" मानसी भी थोड़ा नरम हुई।

"हम्म , मैं घर जाकर बात करता हूँ" कहकर जयन्त उल्टे पाँव वापस चला गया।

घर में सबसे बात करके किसी तरह उसने बामुश्किल सबको शादी के लिए राजी कर लिया। तय समय पर शादी तो हुई लेकिन तनाव भरे माहौल में। वर पक्ष में सबके मुँह फूले रहे और वधू पक्ष में सबके मुँह उतरे रहे। सबको एक अनजाना डर घेरे हुए था।

खैर, शादी हुई और मानसी दुल्हन बन ससुराल आ गई। ससुराल में सिर्फ जयन्त की बड़ी बहन जया दीदी ही थीं जो उसकी हर बात का ध्यान रख रही थीं और उससे बहुत प्यार से बात कर रही थीँ। बाकी सब धीमे धीमे ताने ही मार रहे थे।

एक दो दिन में सारे मेहमान चले गए । अगले दिन जया दीदी और जीजाजी भी जाने वाले थे। रात के खाने के बाद अचानक बाहर जया दीदी और जीजा जी के जोर जोर से बोलने की आवाज आई तो घबरा कर मानसी ने बाहर जाने की कोशिश की पर जयन्त ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया कि मियाँ बीबी की लड़ाई है, अपने-आप बन्द हो जायेगी। बाहर की आवाजें साफ सुनाई दे रहीं थीं। दीदी रोते रहते कह रहीं थीं, " मम्मी पापा मैनें आपसे हमेशा ये बात छिपाई है कि अभय और इसके घरवाले शुरू से ही कम दहेज मिलने से नाराज रहते हैं। हर समय ताने मारते हैं कि एम डी डाक्टर मुफ्त में मिल गया। अब इनको नया भूत सवार हो गया है कि मुझे अपनी क्लीनिक खोलनी है तो अपने माँ-बाप से पचास लाख रुपए लाओ।"

इतने मैं जीजा जी चीखने लगे, " हाँ , तो शादी में कुछ नहीं दिया तो अब तो दीजिए"

" लेकिन हम इतने पैसे कहाँ से लायेंगे ?"पापा ने लाचारी दिखाई।

"तो फिर रख लीजिए अपनी बेटी को अपने पास, हमेशा के लिए, मैं चला"

यह सुनना था कि जयन्त की मम्मी ने रोना शुरू कर दिया। उनको रोता देख जया ने एकदम से मुस्कुराते हुए कहा," अभय, बस, बहुत ओवर एक्टिंग करते हो आप" दोनो आकर मम्मी को चुपाने लगे , " मम्मी, आपको कितना बुरा लगा न, सोचो, ऐसा ही मानसी कै पेरेंट्स को भी लगा होगा। आप क्यों नाराज हो सबसे। आपका बेटा खुश है न , खुशियाँ प्यार से आती हैं पैसे से नहीं, दुनियां को क्या शान दिखानी । वैसे भी दहेज माँगना कानूनन अपराध है,पता तो है न"

माँ अपने आँसू पोंछते हुए बोलीं," ठीक कह रही हो बेटा,तुमने मेरी आँखे खोल दीं, वो कहते हैं न कि जिसके पैर न पड़ी बिबाई वी क्या जाने पीर पराई"

तभी जयन्त मानसी को ले बाहर आया और हँसते हुए बोला," क्या बात है!!... दीदी, जीजाजी, आपलोग तो कमाल के एक्टर हो। "

मानसी हैरान हो बोली, " यानि कि ये आप तीनों की प्लानिंग थी"

तभी मम्मी जयन्त के कान पकड़ती हुई बोली, " शैतान कहीं का, चल परे हट, मुझे अपनी बहू की मुँह दिखाई करनी है "

इनपुट सोर्स : सुनीता रमन, एडमिन फोकस साहित्य, लखनऊ सिटी।


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